मंगलवार, 7 जुलाई 2026

जगत आकार छथि मोहन [मैथिली कविता]

 


कखनो यशोदा मैया केर नयनक तारा छथि मोहन,
वृन्दावन राधिका केर हृदय झंकार छथि मोहन।
देलखिन गीता केर ज्ञान,प्रलय गाण्डीवधारी के,
भवसागर पार लगेनिहार, तारणहार छथि मोहन।।

नाचैत नागक फन पर, यमुनाक रखवार छथि मोहन,
मधुबन ग्वाल-बाल सभक सखा सरकार छथि मोहन।
गोवर्धन के उठौलनि जे, केलैन धारण कंगुरिया पर
प्रेमक सुरलहरि में बंसीवट राधेश्याम छथि मोहन।।

सुदामा केर चाउरक बदले गेलाह सब हारि जे मोहन,
दुर्योधनक मेवा त्यागि खेलाह विदुरक साग जे मोहन ।
प्रेमक अर्थ सिखौलनि, प्रेम केर मान देलनि जग में,
तुलसीकेँ, सत्यभामाक धनसँ बढि सम्मान देलनि मोहन।।

कालक गति के स्वयं जे अपन आधार राखैत छैथ,
अधर्मक नाश करबाक हेतु सुदर्शनचक्र धरय छैथ।
रुक्मिणीक प्रिय मनोहर, राधाक प्राण-प्रेम छथि,
युग-युग में अवतारी, चिर निराकार छथि मोहन।।

कखनो कहेला रणछोड़, कखनो जगतक पालनहार,
सदैव अधर्मक विरुद्ध, धर्मक तेजस्वी बनल ललकार।
जतए प्रेम, ततए मोहन, जतए भक्ति, ओहिठाम ओ,
कण-कण में समाएल, जगत आकार छथि मोहन।।

प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली

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