मंगलवार, 15 अक्टूबर 2024

अम्मल [मैथिली कविता - मंद बुद्धि के छंद]

 

अम्मल (Maithili Poem)

जे खाय अछि गुटका
भऽ जाय अछि गलचुटका।
जे खाय अछि पान
दै अछि सभ के ज्ञान।
जे पीबय अछि चाय
तरोताजा भऽ जाय।
रोज पिबय जे दारू
भऽ जाय अछि बीमारू।
जे पीबय अछि पानि
बनल रहय अछि जुआनि।
पैघ के करय जे आदर
पाबय नेहक चादर।
जे पोथी पढय अछि
ज्ञान ओकर बढ़य अछि।
भोरे करय जे ध्यान
होय ओकर कल्याण।
जे मेहनत करय अछि
आगा ओ बढ़य अछि।
नेह बढाबय अछि जे
नेहे पाबय अछि ओ।

ताकय जे मंच माला

बुझु दाल मे काला ।
चलु आब हम जाय छी
घुरि-फिरि के आबय छी। 


 

गिद्ध [मूल मैथिली कथा का अनुवाद]

 



गिद्ध

लेखक एवं अनुवादक : प्राणव झा

(केवल स्वांतः सुखाय, अकादमिक एवं शोध कार्य हेतु )

 दादी, घर पर गिद्ध बैठ जाने से क्या होता है?” सात बरस का रमण, जो अभी जीवन के सरोवर में अपने नन्हे पाँव भिगो रहा था, जिज्ञासा के तरंगों में उतरते हुए अपने बाल मन मे उठे इस प्रश्न को दादी से पूछते हुए बोला था। आज सुबह से ही गाँव की चौपाल में एक ही चर्चा थी – के० डी० झा के मकान की छत पर गिद्ध बैठ गया है। सबसे ऊँचा मकान भी तो गाँव मे उन्ही का था !

 

दादी ने आँगन में मिंजाई करते हुए कहा था -बाबू रे, जिस घर की छत पर गिद्ध बैठ जाए, वहाँ भूत-प्रेत का वास होने लगता है। अनिष्ट की छाया मंडराने लगती है। वह तो मरे हुओं का भक्षक है, गंध और गला-सड़ा मांस ही उसका भोजन है। जहाँ वह दिखे, वहाँ समझो अपशकुन हुआ।”

 
रमण ने कई बार गिद्ध नाम के इस विशालकाय पक्षी को घर के पिछवाड़े मे बड़े ताड़ के पेड़ पर बैठा देखा था। कई बार उसकी लंबी परछाई से वह डर जाता था। कई बार उसने दादी से साथ खेतों की ओर जाने पर खेतों की पगडंडियों या चारागाह मे बैठे देखा था जहाँ वह मरे जानवरों के शव पर अपने भारी पंजों से कब्जा जमाए बैठा होता।

 
टीवी पर उसने रामायण में जटायु को सीता-हरण के समय रावण से जूझते और फिर उसे रामचरणों में निःस्वार्थ समर्पण करते हुए प्राण त्यागते हुए देखा था। उसने देखा था कि किस प्रकार भगवान राम ने अपने अश्रुधार से नहलाते हुए गिद्धराज का पितृ समान अंतिम संस्कार किया था। टीवी पर यह दृश्य देख उसका हृदय श्रद्धा से भर उठा था। वही गिद्ध - जिसे उसकी दादी अशुभ
, गंदा और भूत-प्रेत का संकेत बताती थीं - रामकथा में बलिदान और भक्ति का प्रतीक बन कर प्रकट हुआ था। संपाती की कथा सुनते हुए भी उसके हृदय में कौंध उठी थी एक तीव्र टीस - जिस पक्षी ने अपने पंखों की आहुति देकर अपने भाई को सूर्य से बचाया था, वही समाज की नजरों में "अशुभ" ठहरा दिया गया! एक ओर सदाचार और बलिदान का प्रतीक तो दूसरी ओर अपवित्रता का पर्याय! एक ओर देवत्व का स्पर्श, दूसरी ओर तिरस्कार की छाया! रमण के मन को यह विरोधाभास कई बार जिज्ञासा के थपेड़ों सा झकझोर देता था। बालक रमण की यह उलझन कोई सामान्य संशय नहीं थी - यह तो समाज के दोहरे दृष्टिकोण की प्रतिक्रिया थी, जहाँ एक ही जीव को कभी पूजा जाता है, तो कभी पत्थर मारा जाता है। उसके भीतर जैसे कोई घनघोर प्रश्न कौंधता - "क्या किसी के कर्म की गरिमा केवल उसकी जाति या स्वरूप से तय होती है?" उसका भोला मन इस पाखंडी दृष्टि से बार-बार दो-चार होता था।


ये वो दिन थे जब रमण गाँव के कच्चे आँगन और मिट्टी की सोंधी गंध में पल रहा था। पर समय की रथ-चक्र को कौन थाम पाया है? समय बीतने पर रमण अपनी दादी और माँ के साथ पिताजी के पास रहने गाजियाबाद चला आया था। रमण के पिताजी गाजियाबाद के एक फैक्ट्री में लेखाकार का काम करते थे। रमण का नाम एक निजी विद्यालय में लिखा दिया गया था। अब रमण 13  वर्ष का हो गया था। घर से विद्यालय करीब 2 किलोमीटर पर था। रमण प्रतिदिन सायकल से विद्यालय जाता था। रास्ते में एक चारागाह पड़ता था जिसमे रमण अक्सर देखते थे कि लोग अपने मरे हुए पशुओं के लाश को फेंक कर चले जाते थे। रमण देखता था कि अक्सर ही एक 16-17 वर्ष का लड़का उन लाशों के चमड़े छुड़ाता रहता था और उस लाश को गिद्ध – कुत्ते सब मिल कर खाते थे। बाद मे वह लड़का उस मे से बचे हड्डी सब को भी अपने झोले मे भर लेता था। यह देख कर रमण के मन मे उस लड़के के प्रति बहुत ही घृणा का भाव आता था। किन्तु मन मे जिज्ञासा भी उत्पन्न होता था कि “वह ऐसा गंदा काम क्यूँ करता है? उन हड्डियों का क्या करता है?” किसी-किसी से सुना था कि कुछ लोग हड्डियों से काला जादू करते हैं। कितने ही बार रमण को हुआ कि उससे पूछें कि “तुम यह क्या करते हो और इस काम से तुम्हें क्या मिलेगा?” किन्तु रमण को अपने और उसके वेश-भूषा का अंतर हमेशा ही उसके पास जाकर उसके विषय मे बात करने का साहस करने से रोक देता था।

एक दिन रमण जब विद्यालय जा रहा था तो उसके घर से थोड़ा ही आगे एक मोदियाइन का घर था जिसने 3-4 मवेशियाँ पाल रखे थे । उसने देखा कि वहाँ पर कुछ लोग उस लड़के हो घेरे हुए हैं और अंधाधुंध लाठीया बरसा रहे थे। भीड़ से कुछ सम्मिलित स्वर सुनने में आ रहा था कि "मारो साले को, यह गिद्ध है, यही बहुत दिनों से नजर लगाए हुये था फलां के मवेशी पर जिस कारण से वह मर गया। बहुतों के मवेशियों पर इसकी गिद्ध वाली नजर रहती है... आदि आदि।" मार खाते-खाते वह लड़का अधमरू हो गया था। वह तो अच्छा हुआ कि किसी ने पुलिस को सूचित कर दिया था, इसीलिए पुलिस ने आकर  के भीड़ को तीतर-बितर कर दिया और उस लड़के की जान बची।

समय बीता, पर रमण के याद से वह घटना गई नहीं। कुछ दिनों के बाद एकदिन रमण घर पर किसी बात से रूठ गया था। छुट्टी का दिन था और नहाया-धोया भी नहीं था। ऐसे ही बनियान और  पैजामा पहने घर से निकल गया था। घूमते-घामते उसी चारागाह की ओर पहुंचा। देखा तो वह लड़का फिर नजर आया। बस फिर क्या, रमण उसके पास पहुँच गया। उससे पूछा – अरे! तुम ऐसा गंदा काम क्यूँ करते हो? लोगों के मवेशियों को काला जादू से मार देते हो , और उनका खाल खींच लेते हो। उस दिन इतनी मार पड़ी फिर भी वही काम!


उसने कहा मरे हुए मवेशियों का खाल-हड्डी निकालना मेरा खानदानी धंधा है। किन्तु हम लोग किसी के मवेशियों को मार देते हैं या कि नजर-गुजर लगा देते हैं यह शत प्रतिशत अनर्गल आरोप है हम  लोगों पर। इस प्रकार के भीड़ अक्सर ही हम लोगों पर अत्याचार करते हैं।


हम लोग जो यह चमड़ा छुड़ा कर ले जाते हैं, उसी की सफाई कर के और फिर पॉलिश आदि कर के रंग-बिरंग के जूते , बेल्ट, बैग, बटुआ और कितने ही अन्य अन्य श्रृंगार की और उपयोग की वस्तुएँ  बनाई जाती हैं, वह सभी को भोग्य और शुद्ध लगता है। और आपने क्या कहा  हड्डी.....हा..हा..हा.., अरे जी हड्डी का हम लोग कालाजादू मे उपयोग नहीं करते हैं। सारा माल दिल्ली के शाहदरा-उस्मानपुर एरिया में भेज दिया जाता है। जहां पर उसकी सफाई होता है। फिर फैक्ट्री में कटाई-घिसाई-पॉलिश कर के रंग-बिरंग के  सजावट की वास्तुएँ, भगवान की मूर्तियाँ, महिलाओं के श्रृंगार के लिए  माला-झुमका आदि कितने ही आकर्षक वस्तुएँ इन्ही हड्डीयों की बनाई जाती है। बड़े मेले और बाजार सब में जो सस्ती-सस्ती मोती मालाएँ सब देखते हो, वो क्या कोई असली होती हैं! सभी इन्ही हड्डीयों की बनाई जाती है। सो यह सारी वस्तुएँ कोई भी हो, पंडित, मुल्ला, बनिया-रार, साहेब-गुलाम सभी को प्रिय लगती हैं। और हम जैसे काम करने वाले सभी के लिए गंदे होते हैं! 


यदि हमारे जैसे काम करने वाले नहीं हो, और यह गिद्ध कुत्ते नहीं हों तो आपका यह समाज मरे हुए जानवरों के सड़े हुए लाशों से पटा पड़ा रहेगा और कोई उठाने वाला नहीं मिलेगा। हम लोग हैं तो आप लोग इस सड़ाँध से छुटकारा पाते हैं। किन्तु फिर भी आप लोग हमे गिद्ध कह कर प्रताड़ित करेंगे, अवसर पाते ही लठियाएंगे, मारेंगे, और इज्जत कि तो ख़ैर छोड़ ही दीजिए!


अब जैसे किसी ने रमण के आँखों पर पड़ा पर्दा हटा दिया हो।
वह सब कुछ समझ गया था पारिस्थितिकि में गिद्ध का महत्व भी, और यह भी समझ गया था कि कैसे आपका पहनावा और वेश भूषा भी आपको किसी व्यक्ति से संवाद करने मे और उसके विषय मे वास्तविकता जानने मे एक अवरोधक की भांति कार्य करता है। उसे भली-भांति ज्ञात हो गया था कि वेशभूषा मात्र शरीर का आवरण नहीं, बल्कि कई बार संवाद और समझ के बीच खिंची दीवार बन जाती है। जैसे कोहरे की परत धूप की गर्मी को छुपा लेती है, वैसे ही वस्त्रों की परतें किसी इंसान की आत्मा को ओझल कर देती हैं। उसे याद आया - गांधीजी के चंपारण दौरे का वह क्षण, जब चंपारण के धूल-धूसरित खेतों में अधनंगे किसानों की कंगाली और व्यथा देख उन्होंने अपने विलायती वस्त्र त्याग दिए थे। वह सूट-बूट नहीं, श्रेष्ठता की भावना का खोल था, जिसे उतार फेंककर गांधीजी भारत के अंतिम जन के दुःख को छूने समझने और उसके निवारण के लिए सत्याग्रह करने में समर्थ हो सके थे। रमण को लगा - वह भी आज कोई खोल उतार चुका है,कोई पर्दा सरका चुका है। अब रमन की चेतना मे एक नया प्रकाश उतर आया था। वह जान गया था कि समाज की परछाइयों में काम करने वाले लोग अक्सर बहुत ज़रूरी होते हैं, पर वही सबसे अधिक भुला दिए जाते हैं।

[28 सितंबर 2019]

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