बुधवार, 15 नवंबर 2023

सूखता तालाब प्यासा गाँव! (लेखक एवं अनुवादक: प्रणव झा)

इस बार गांव में एक भतीजे का उपनयन था और ऑफिस में भी तीन चार दिनों की छुट्टियां लगातार मिल रही थी। बस, फिर क्या एकाएक गांव जाने की योजना बन गई।  योजना भी ऐसी कि जूड़-शीतल के दिन संध्या तक गांव पहुंचता। मगध एक्सप्रेस अपनी आदत अनुसार 4 घंटे विलंब से पटना पहुंची। अब वहां से बरौनी की ट्रेन पकड़नी थी।  गर्मी के दिन में सूर्यास्त कुछ देर से ही होता है। यही कारण था कि राजेंद्र पुल पर जब लगभग 6:30 पहुंचा तो सूर्यास्त का मनोरम दृश्य दृष्टिगोचर हुआ था। उस मनोरम छटा में तीन चार लड़के गंगा जी की बीच धार में गोता लगा रहे थे। यह दृश्य देखने योग्य था। किंतु यह क्या! अचानक से ध्यान गया गंगा जी तो सुख कर आधा हो गई है और पानी की धाराएं केवल उनके उदर तक में बचा हुआ है। अब यह स्थिति भयावह दिख रहा था। तो क्या इसका मतलब सूखा अपने गांव घरों की तरफ भी दस्तक देने लगी है! जब गांव पहुंचा तो जुड़ शीतल का कोई नाम निशान भी नहीं दिखा। यद्यपि मैं अंधेरा होने के बाद ही पहुंचा था।

अगले दिन सुबह सुबह गांव की और विदा हुआ। रास्ते में मिलने वाले लोगों से दुआ सलामी करते हुए नदी किनारे पहुंचा। किंतु देखता हूं तो यह क्या? नदी तो है ही नहीं! गांव का बलान नदी सूखकर पिच रोड बना हुआ है, और साइकिल, मोटरसाइकिल, उस रास्ते से सरसराते हुए इस पर से उसे पर हो रहे हैं। ध्यान गया गांव के मुखिया (जिसके जनेर-ढाईचा के फसल नदी किनारे में लहराता था) के अतिक्रमण की सीमा और अधिक बढ़ गई है और जहां हमेशा नदी की धारा बहती थी वहां मुखिया के फसल लगे हुए हैं। वैसे उनकी हालत भी पिलपिली सी हो गई थी। गांव से नदी विलुप्त हो जाना मतलब की जैसे मानिए किसी सौभाग्यवती के मांग से सिंदूर मिटा देना हो!

 

मानता हूं कि मैं ज्यादा दिन गांव में नहीं रहा हूं, किन्तु जितना दिन भी रहा हूं नदी से एक लगाव रहा है। बाल्यावस्था में नदी नहाने का अपना उत्साह होता था। मां के मना करने पर भी कहां मानता था, और गर्मी के महीना में तो समझिए कि जब मन होता तभी चल देते थे नहाने। कोई कमीज बनियान का काम नहीं बस किसी से गमछा मांगो और कूद जाओ। जब तक थोड़ी देर नदी में गोता लगाते तब तक इतनी देर में नदी किनारे भाइंट के पौधे पर फैला बनियान कच्छा सब सुख जाता था। हां, इस बात का अफसोस रहेगा की मैं तैरना नहीं सीख पाया। यद्यपि गांव के भाई लोगों ने से थोड़ा बहुत सीखा था किंतु कालांतर में वह भी भूल गया। वैसे गांव घर में बच्चों को दोपहर के समय में नदी किनारे जाने से मना किया जाता था जिसके लिए भूत से लेकर पनडुब्बी तक का डर दिखाया जाता था। नदी किनारे में मछली और घोंघा पकड़ने का भी अनुभव रहा है। इस मामले में मीता भाई जी बहुत तेज थे। समझिए की कांटे और चारे के असली खिलाड़ी तो वही थे और हम लोग तो बस स्टेपनी टाइप में साथ लगे रहते थे।

 

खैर छोड़िए, मैं भी कहां पहुंच गया। हनुमान चौक पर पहुंचा तो देखता हूं कि लड़के लोगों की चौकड़ी जमी हुई है। मीता भाई जी वहां थे। मैंने कहा अरे मीता भाई जी यह तो जुलुम हो गया। वह आशंकित होते हुए बोले - सो क्या? क्या हुआ? मैंने प्रति उत्तर में बोलामहाराज गाँव की नदी विलुप्त हो गई और आप पूछते हैं क्या हुआ!” किंतु उनकी प्रतिकृया बहुत सर्द थी। वह बोले यह सब भगवान की माया है। देश दुनिया में पाप बढ़ रहा है। इसका दुष्परिणाम तो ऐसा ही होगा ना जी। मैंने कहा कि भाईजी, फिर भी गांव के लोगों को तो अपना कर्तव्य करना चाहिए ना नदी को बचाने के लिए। सालों साल नदी के तहत गाद से भर कर ऊपर जा रहा है, उसपर से नदी तट पर मुखिया का अतिक्रमण बढ़ता जा रहा है  आज नदी सूख गई, सोचिए कि इसके साथ कितने ही जलीय जीव सबका तो समूल ही नष्ट हो गया होगा। क्षेत्र की जमीन में पानी का लेवल भी नीचे गिर गया होगा।.....हां वह तो सच सच में ही। पहले 50 फीट पर ही चापाकल गड़ा जाया करता था किन्तु अब 100 फीट से कम मे अच्छा पानी नहीं आता है -  बीच में बात काटते हुए कनकीड़बा बोला। मैंने बात को आगे बढ़ते हुए बोला - इस नदी में लोग सब नहाते थे, मवेशी को नहाना और पानी पिलाने के लिए नदी ले जाया करते थे, महिलाएं कपड़ा-वपड़ा तो सब नदी में ही करती थी ना जी। तो जिस नदी से इतना उपकार मिला है उसके लिए कुछ तो चिंतित होना चाहिए ना ऐसे जो नदी की भूमि का अतिक्रमण होता रहेगा तो निश्चित ही नदी विलुप्त हो जाएगी ना।

 

अजी आप शहर से आए हैं वहाँ मौज में रहते हैं। इसीलिए यह आदर्शवादी बातें सब मन में रहा है। दिल्ली से आए लोगों को ऐसे ही गोल गोल बातें मन में आती रहती है। इस बार बीच में बात काटते हुए बंठाबाबाजी बोला।

 

मैं जरा व्यथित होते हुए कहा - हां शायद आप ठीक कहते हैं। मैं पतित हुआ कि गाँव की चिंता की। यह गांव तो जैसे मेरा है ही नहीं! और आप क्या जानते हैं शहर की जिंदगी के विषय में? पानी की किल्लत और उसका मूल क्या होता है यह कोई दिल्ली मुंबई वाला से बढ़िया कौन समझ सकता है? कालोनी सब में पानी को लेकर झगड़ा झंझट प्रतिदिन का किस्सा रहता है। बात तो मरने मारने तक पहुंच जाती है।  बड़ी बड़ी कोठियों और फ्लैट में रहने वालों लोगों को सभी सुविधाएं तो मिलती है किंतु पानी उनको भी नाप जोख कर मिलता है, और उसका बड़ा मूल्य चुकाना पड़ता है। जो स्थिति अभी मैं गांव की तरफ देख रहा हूं, यदि लोग नहीं चेते तो भविष्य में यहां की स्थिति भी वही होने वाला है।

 

 

खैर थोड़ी देर बतकही करने के बाद मैं घर पर पहुंचा और नहाने के लिए बौआजी के कुएं की ओर विदा होने ही वाला था की मां ने टोका - चापाकल पर ही नहा लो, बौआजी के कुएं का पानी मटमैला हो गया है। ओह! एक और अफसोस की बात। जिस दिन से मेरा नदी नहाना छूटा था, गांव में मैं बौआजी के कुएं पर ही नहाता आया हूं। बहुत पवित्र और शीतल पानी होता था उस कुएं का। गर्मी के दो बजे  दोपहर में एकदम शीतल पानी। मुझे याद है बचपन में देखता था की जूड़ शीतल के दिन गांव वाले लोग सब इस कुएं की सफाई करते थे, ढेकुल कसा जाता था, नया रस्सी बांधा जाता था।रामनंदन पंडित जी यजमानी में मिले एक नए बाल्टी को बांधते थे। बच्चों सबके लिए यह उत्सव का माहौल होता था। किंतु अब...!

 

गांव दुकान में अब कोल्ड ड्रिंक के साथ मिनरल वाटर की बोतल भी बिकने लगा था। कुछ समृद्ध लोगों के घर में 20 लीटर वाले आरो पानी का बोतल भी खरीदा जाने लगा था।

 

भोज भारत में अक्सर किसी छोटे बच्चे जिसको परोसने का शौक होता है किन्तु उसको कुशल नहीं समझा जाता है, को पानी परोसने के लिए दे दिया जाता है। कुम्हरम के भोज के समय में गुरकेलवा पानी परोस रहा था। मैंने टोन देते हुए बोला - क्या रे गुरकेलवा! तुम पानी ही परोस रहे हो? वो बोला - अरे भाई जी! सबसे महंगी चीज तो मैं ही परोस रहा हूं।  

वह कैसे - मैंने पूछा।

वह बोला - भाई जी भोजन तो कहीं भी मिल जाएगा किंतु इस गर्मी में सबसे अभीष्ट वस्तु तो ठंडा पानी ही लगता है।  गांव का आधा चापाकल तो सूख गया है। कुआं-नदी सब का हाल तो आपने देखा ही होगा। आप ही कहिए कि मैं क्या गलत बोला हूं? इतना सा गुरकेलवा एक गंभीर बात को बड़ी विनोदी भाव में बोल गया था।

 

 

पता लगा था कि गांव का चौधरी सरकार से सस्ता लोन लेकर एक तालाब खुदवाया है। मुझे प्रसन्नता हुई कि चलो अच्छा है, तालाब होने से कुछ तो राहत है, और ताजी मछलियां खाने के लिए भी मिल जाएगी। परंतु माँ  से जब चर्चा किया तो वह बोली - अरे तालाब में कुछ है भी! वह तो पत्नी पंचायत सदस्य का चुनाव जीती तो जुगाड़ से लोन पास करवा लिए। बैंक को दिखाने के लिए गड्ढा खोदकर मिट्टी भी बेच लिए। लोन के पैसे को सूद पर चढ़ा कर सूद खा रहे हैं। मैंने कहा - देखिए तो धंधा! सही रास्ते पर चलकर कोई पैसा कमाना ही नहीं चाहता है, जिससे लोग के साथ समाज का भी भला हो।

 

 

बहन के यहां गया तो वहां भी वही हाल देखने को मिला। उनका गांव कभी इस बात के लिए नामी था कि उस गांव में 72 तालाब है। आगे-पीछे, इधर-उधर जिधर मुंडी घुमाओ उधर ही छोटा बड़ा तालाब-डाबर देखने मिलता था। किंतु देखा कि इस बार उसमें से कितने ही तालाब डाबर मटियामेट हो गए थे।  बचे हुए में से भी बहुत सारे जर्जर अवस्था में थे। भाईजी (बहन के जेठ जी) को पता था कि मैं मछली प्रेमी आदमी हूं। जिस बार बहन के यहां जाता था किसी किसी तालाब से मछली ले आते थे। दोपहर को जब भाईजी सकरी जाने के लिए विदा होने लगे तो मैंने पूछा कि भाई जी कहां जा रहे हैं? बोले कि आता हूं सकरी से मछली लेते हुए। मैंने बोला - क्यों इस बार गाँव मे उपलब्ध नहीं है क्या? वह बोले - गांव के तालाब सब सूखे जा रहे हैं। आजकल कहीं मछली नहीं मारा जा रहा है इसलिए इस बार आपको सकरी का मछली ही खिलाता हूँ।

 

मेरे एक मधुबनी के मित्र से सूचना मिली कि शहर के आसपास जो तालाब-डाबर सब था जिन में से कितने में ही शहर का नाला भी बहा करता था उन सब को ढक कर उस जगह पर मकान दुकान सब बनाया जा रहा है। इस कारण से भूजल स्तर में गिरावट के साथ ही शहर में जल के निकासी में भी समस्या हो रही है।

 

वापस लौटते समय ट्रेन में जब एक महिला को 15 रुपए एमआरपी वाले पानी की बोतल को 20 रुपए में बेचने वाले विक्रेता से इस बात को लेकर जिरह करते देखा तो ये बातें सब एक एक करके याद आने लगा।मैं सोचने लगा कि अपने देश में जो हजारों हजारों की संख्या में तालाब-डाबर-दिघी थे ये अचानक से तो नहीं प्रकट हुए होंगे। इनके पीछे निश्चित ही यदि बनवाने वालों की इकाई होगी तो बनाने वालों सब की दहाई भी होगी। और यह इकाई दहाई सब मिलकर के सैकड़ो हजारों बन गए होंगे। पिछले कुछ 10-20 साल में विकास का नया पाठ पढ़ गया समाज इस इकाई दहाई सैकड़ा हजार को सीधे शून्य में पहुंचाने का काम कर रहा है। इस विरासत को संभालने की चिंता ना समाज को हो रही है और नहीं सरकार को। और यदि कहीं हो भी रही है तो सरकार और समाज में सामंजस्य नहीं बैठ रहा है। मैं यह भी सोचने लगा कि यदि जिंदगी में भगवती अवसर और सामर्थ्य दी तो गांव में पांच कट्ठा जमीन खरीद कर वहां एक तालाब खुदवाऊंगा और उसमे मछली पालूँगा। अब ट्रेन की गति के साथ मैं यही सब योजना का खाका खींच रहा हूं।

बस इतना ही था यह किस्सा। (17 मई 2017)

मंगलवार, 17 अक्टूबर 2023

फेसबुक का चक्कर

 

फेसबुक का चक्कर (मूल कहानी :मैथिली)

लेखक एवं अनुवादन : प्रणव झा

कुशाल जी नोएडा के एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में मैनेजर थे।  जैसा नाम कुशल वैसा ही वह अपने पेशे और व्यक्तिगत जिंदगी में सब तरह के कार्य मे कुशल थे। उनमे सामाजिकता भी था और समाज से जुड़े रहने का शौक भी था। महानगरीय जिंदगी का एक साइड इफेक्ट यह है कि यहां की जिंदगी के भागम भाग में आप नहीं चाहते हुए भी समाज से कट जाते हैं। आधुनिक काल में मनुष्य के जीवन शैली में तकनीक का बहुत बड़ा योगदान है। इसी क्रम में तकनीक भागा दौड़ी में व्यस्त मनुष्य को समाज से जोड़ने में भी मददगार साबित हो रही है। जहां एक तरफ नेता से लेकर अभिनेता तक सब दिन भर ट्विटर पर टिपिर टिपिर करते रहते हैं वहीं अन्य अन्य लोग भी फेसबुक और व्हाट्सएप की मदद से अपने बिछड़े समाज समांग और मित्रों से जुड़े रहने के नए प्रयोग में लगे हुए हैं। ऐसे लोगों में कुशल जी का नाम अग्रणी श्रेणी में रखा जा सकता है क्योंकि उनका फेसबुकिया कीड़ा खूब काटा है। दिन भर में देखा जाए तो 24 घंटे में 18 घंटे तो निश्चित ही फेसबुक पर ऑनलाइन मिल जाएंगे। नाना प्रकार के पोस्ट करते रहते हैं राजनीति से लेकर समाज तक और फूल पत्ती से लेकर जंगल झाड़ तक उनके अंदर दिनों दिन इस फेसबुकिया कीड़े का संक्रमण बढ़ता जा रहा था जिसका परिणाम यह हुआ कि उनकी पत्नी को अब इस आदत से कुछ दिक्कत जैसा होने लगा था। दूसरी बात यह की कुछ सामाजिक और क्षेत्रीय समस्याओं पर भी अपनी प्रक्रिया ताल ठोक कर देते थे जो कुछ लोगों को पसंद नहीं आता था। इस बात की शिकायत भी इनबॉक्स में खूब मिलता था। चलो जो भी हो किंतु दूसरी बात को कौन समझकर पहली बात को ही प्रमुख माना जाए।

ऐसे ही एक दिन घर में इस फेसबुकिया रोग को लेकर खूब महाभारत मचा। धर्मपत्नी इनको खूब सुनाई। विवाह से लेकर आज तक के जितने ताने थे तब याद कर करके उन सभी से पत्नी ने इनको अलंकृत किया।

तानो के ऐसे दमदार डोज से कुशल जी का मन अजीर्णता की शिकार हो गई। उनको इतनी सारी बातें पची नहीं। वह अपने मोबाइल में से फेसबुक को अनइंस्टॉल करने का कठोर फैसला किया। उनके लिए यह फैसला लेना नोटबंदी के फैसले से कम कठोर नहीं था। किंतु जैसे सरकार को नोटबंदी में देश का हि समझ में आया वैसे ही इनको वर्तमान स्थिति में फेसबुक बंदी में ही अपना हित समझ में आया। तथापि फेसबुकिया कीड़े का आसार इतनी जल्दी कैसे जा सकता था! वह फटाफट अपने मोबाइल को निकाले और लगे अपने फेसबुक स्टेटस अपडेट में – “पब्लिक के भारी डिमांड पर मैं कल से फेसबुक छोड़ रहा हूं, इसीलिए जिन जिनको जो कुछ कहना सुनना हो वह आज आधी रात तक कह सकते हैं।”

उसके बाद आधी रात तक पोस्टों की जैसे बाढ़ आ गई थी और वैसे ही गीदड़ के हुआ हुआ जैसा उन पोस्टों पर कमेंट का हुलकारा होने लगा था।  ज्यों ज्यों  समय बीतता जा रहा था कुशल जी का मन बेचैन होने लगा था। किंतु इस बार फेसबुक बंद करने का प्रण उन्होंने कदाचित भीष्म पितामह को साक्षी मानकर लिया था और या की पत्नी के शब्द वाण उनको उसी तरह घायल किया था जैसे अर्जुन के वाण कुरुक्षेत्र में भीष्म पितामह को। परिणाम या हुआ कि अतः उन्होंने फेसबुक बंद कर दिया।

किंतु किसी के आने जाने से जिंदगी का चक्र रूकता है क्या!  ऐसे ही फेसबुक का चक्र भी उनकी अनुपस्थिति में अपनी गति से चला रहा। यद्यपि कुछ निकटवर्ती मित्र सबसे वाया व्हाट्सएप विमर्श का सिलसिला चालू ही था।

इस घटना का कुछ ही दिन बीता होगा कि एक दिन कुशल जी को एक फोन आया हेलो!

 “हे हे हे हे... मैनेजर साहब जी नमस्कार। “

 “नमस्कार! आप कौन?” प्रति उत्तर में कुशल जी बोले।

 “हे हे हे हे हे  ...नहीं पहचाने! जी पहचानेंगे कैसे भला। पहले कभी भेंट हुआ होता तब ना! मैं आपका फेसबुक मित्र हूं नाम है पुष्पेंद्र नाथ चौधरी। पुष्पेंद्र नाथ का अर्थ हुआ पुष्प का राजा अर्थात कमल और उनके नाथ अर्थात कमल पति भगवान विष्णु। हे हे हे हे हे ...” अपना साहित्यिक परिचय देते वह फिर से बलहँसी हँसने लगे।

कुशाल जी कुछ याद करने की चेष्टा करते हुए फिर से बोले “ओह अच्छा। कहिए क्या समाचार”

“हे हे हे है मैं भी यही सोनीपत में रहता हूं। आपके फेसबुक पोस्ट से बहुत प्रभावित रहता हूं।  समाज में आप जैसे लोगों की बहुत आवश्यकता है इसलिए आपके फेसबुक छोड़ने से मैं बहुत दुखी हूं।  आपका अंतिम पोस्ट सब मैंने देखा था। मैं जानता हूं कि आपकी बातों कुछ लोगों को लोंगिया मिर्ची की तरह लगती है। और ऐसे ही लोगों की धमकी के कारण पने फेसबुक छोड़ा है। किंतु जब तक मेरे जैसे लोग जीवित हैं आपको डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसी संबंध में मैं आपसे भेंट करके विमर्श करना चाहता हूं। बहुत तिकड़म से आपका नंबर उपलब्ध हुआ है। आज मैं नोएडा आ रहा हूँ इसलिए आपसे मिलने का अभिलाषी हूं।“

“किन्तु मैं  ऑफिस के काम में थोड़ा व्यस्त हूं” कुशल जी बोले।

अरे अरे अरे! बस कुछ मिनटों की मुलाक़ात चाहता हूँ। मैं बस एक घंटे मे पहुँच रहा हूँ।“ यह बोलते हुए उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना उधर से फोन रख दिया गया।

फोन रखकर पुनः कुशल जी अपने कार्य मे व्यस्त हो गए। करीब डेढ़ घंटे बाद स्वागतकक्ष से फोन आया “ सर कोई पुष्पेंद्रनाथ चौधरी आपने मिलने आए हैं।“

“ठीक है भेज दो” बोलकर कुशल जी पुनः अपने कार्य मे व्यस्त हो गए।

दो मिनट बाद अर्दली एक थुलथुल काया वाले व्यक्ति को साथ मे लिए उपस्थित हुआ। सफ़ेद धोती, उसपर से पसीने से भीगा हुआ सिल्क का कुर्ता, लंबा टीका किए हुए इस व्यक्तित्व को भीड़ मे भी आसानी से पहचाना जा सकता है कि यह कोई मैथिल है।

“आइए बैठिए” अतिथि का स्वागत करते हुए कुशल जी बोले।

अहा! मैनेजर साहब आज आपसे मिलकर मेरा जीवन धन्य हो गया। कब से सोच रखा था, आज जाकर आप पकड़ मे आए हैं। अच्छा ये सब जाने दीजिए, पहले यह बताइये कि आपने फेसबुक क्यूँ छोड़ा। आपको भाषा बचाओ आंदोलन वालों ने कुछ कहा है, कि शिथिला राज्य वालों ने धमकाया है, या कि शिथिला हुरदंगी सेना वालों ने घुड़की दी है? आप बस एक बार नाम लीजिए बाँकी मैं देख लूँगा। मैं इन लोगों का सारा खेल-बेल समझता हूँ। अरे महाराज! मैं भी बीस वर्षों से इधर ही रहता हूँ और दिल्ली के एक-एक कालोनी सब जहां मैथिल-बिहारी बसे हैं, मे पैठ बिठाकर रखा हूँ। इलाका के छंटे हुए बदमाश लोग मेरे नाम से धोती ...... धोती तो खैर पहनते नहीं हैं, हाँ पैजामे मे सुसू कर देते हैं। इसी प्रकार से चौधरी जी करीब आधे-पाउने घंटे तक खूब हवाबाजी किए।

जब हवाबाजी का क्रम कुछ रुका तो बातचीत की दिशा मोड़ते हुए चौधरी जी बोले : “हें.. हें... हें.... आपने भोजन तो नहीं किया होगा न ?

अब चार बजे दोपहर के समय मे ऐसे प्रश्न का क्या उत्तर दिया जाए ! अतः कुशल जी इस प्रश्न का जवाब एक प्रश्न से दिए “क्या आपने भोजन नहीं किया है?”

“आह! मैं तो घर से भोजन कर के ही विदा हुआ था। अब तो जो होगा वो नाश्ता-पानी ही होगा। मेरी पत्नी तो जलपान भी साथ मे बांध रही थी। किन्तु मैंने मना करते हुए कहा कि मैनेजर साहब बिना नाश्ता कराए मानेंगे नहीं। इसलिए व्यर्थ ही मुझे यह सब लौटा कर लाना होगा।“

चौधरी जी का आशय समझने मे कुशल जी को कोई दिक्कत नहीं थी। तथापि मन ही मन कुछ राहत का अनुभव करते हुए सोचने लगे कि हाथ ऐसे ही टाइट चल रहा है, ऐसे मे यदि जलपान मात्र कराके इन से पीछा छूट रहा है तो सौदा महंगा नहीं है।

इस निर्णय पर पहुँचते हुए वो चौधरी जी से बोले । चलिए फिर कुछ जलपान कर लिया जाए। उनको साथ लिए कुशल जी बगल के एक रेस्टोरेन्ट मे पहुंचे।

वहाँ बैरा को बुलाकर उसे दो समोसे, तो गुलाबजामुन और दो कप चाय का ऑर्डर दे ही रहे थे कि चौधरी जी बीच मे कूदते हुए बोले “ ओह! एक जमाना था जब एक प्लेट समोसा मतलब दो समोसा समझा जाता था और उपास से अतिरिक्त जितना लिया जाए उसका कोई हिसाब नहीं। और अब तो एक समोसे का फैशन आया है। जो कहिए, किन्तु मेरे जैसे लोगों का तो एक समोसे मे मन असंतुष्ट ही रह जाता है। और गुलाबजामुन का क्या पूछा जाए। बाराती सब मे तो गिनती का कोई हिसाब ही नहीं रहता था। खानेवालों मे शर्त लगता था तो मामलासौ, डेढ़ सौ, दो सौ तक टिका  देते थे। किन्तु अब के युग को क्या कहें !”

यह कहते हुए उन्होने बैरे को चार समोसे 20 गुलाबजामुन और दो कप चाय का ऑर्डर कर दिया और व्यापार कुशल बैरे ने भी कुशल जी के किसी संशोधन का इंतजार किए बिना ऑर्डर लेकर निकल गया। पाँच मिनट बाद इनके मेज पर समोसे और गुलाबजामुन का अंबार लग गया था।

कुशल जी धीरे-धीरे चम्मच-काँटे से तोड़ तोड़ कर समोसा और गुलाबजामुन खाने लगे और उधर चौधरी जी बुलेट की गति से समोसे और गुलाबजामुन को सद्गति देने लगे। जबतक कुशल जी साथ देते हुए दो समोसे और दो गुलाबजामुन खाए तबतक बाँकी का सारा माल चौधरी जी के उदर मे अपना जगह पा चुका था। चाय की अंतिम चुस्की लेते हुए चौधरी जी बोले “ओहो! यह नाश्ता क्या हुआ समझिए भोजन ही हो गया।“

“ठीक है फिर आज्ञा दीजिए।“ बैरा को बिल के बदले मे पाँच सौ का नोट थमहाते हुए कुशल जी बोले।

“हें...हें...हें.... अब तो आप घर ही निकलेंगे न ? मैं सोच रहा था कि इतनी दूर आयाहूँ और आज संयोग बना है तो भाभी से भी एकबार मिलना हो ही जाता तो .... हें...हें...हें.....।” यह कहते हुए चौधरी जी फिर से बलहँसी हँसने लगे। अब इस ढिठाई पर कुशल जी क्या ही कह सकते थे! तिरहुत्ताम का रक्ष रखते हुए मौन स्वीकृति देते हुए चौधरी जी को साथ कर लिए और गाड़ी मे बैठकर घर की राह चल पड़े।

घर पहुँचने पर चौधरी जी कुशल जी की पत्नी “चंदा दाई” और बच्चों के बीच राम गए और तुरंत ही उनके बीच अपने वाक-कुशलता का धाक जमा दिए।

बातचीत इधर उधर की बातों से होते हुए मछली की बात पर पहुँची।  चौधरी जी बोले “ओह! आपके बगल मे तो छलेरा गाँव मे बड़ा मछली बाजार लगता है। बड़ा बड़ा जिंदा रहु मिलता है। चलिए घूम कर आते हैं।“ यह बोलते हुए वो कुशल जी का हाथ पकड़े बाहर जाने का उपक्रम करने लगे।

अब आगे की कहानी आप खुद भी सोच सकते हैं। बहरहाल रात को खूब स्वादिष्ट मछली-चावल-दही-पापड़ का भोजन हुआ। सुबह कुशल जी का छ: बजे से ही एक बैठक थी विदेशी क्लाइंट के साथ वीडियो कान्फ्रेंसिंग पर । वो पाँच बजे सुबह ही कार्यालय के लिए निकल गए और इधर चौधरी जी आठ बजे तक चादर तान कर खर्राटे भरते रहे।

उठने के बाद चाय के साथ पुनः दमदार नाश्ता भी हुआ। चलते समय वो पुनः कुशल जी के पत्नी को हाथ जोड़ कर क्षमायाचना का आडंबर पसारते हुए बोले “हें...हें...हें...भाभी फिर अब आज्ञा दीजिए। मेरे कारण आप सब को जो कष्ट हुआ होगा उसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ ...हें...हें...हें....”

“नहीं नहीं इसमे कष्ट की क्या बात है। अतिथि सत्कार तो हम सब का परम कर्तव्य है।“ यह बोलकर चंदा दाई इनके जाने की आश मे दरवाजे के पास खड़ी हो गई थी, किन्तु चौधरी जी एक बार पुनः कुछ संकोच करते हुए और बलहँसी हँसते हुए बोले “हें...हें...हें...जिस काम से नोएडा आया था उसमे कुछ पैसे की कमी पड़ गई। मैनेजर साहब स्वयं होते तब तो कोई बात ही नहीं थी, जितना बोलता पूरा कर ही देते। किन्तु वो तो सुबह सुबह ही मीटिंग के लिए निकल गए हैं।। इसलिए यदि दो हजार रुपए भी जो हो जाते तो...”

चंदा दाई थोड़ा सा पसोपेश मे चौधरी जी के हाथ मे दो हजार का एक नोट थमहा दी ।

शाम को जब कुशल जी कार्यालय से लौटे तो चंदा दाई इनके हाथ से मोबाइल छीन कर कुछ करने लगी । कुशल जी को हुआ कि हे भगवान! अब कौन सा कांड हो गया? थोड़ी देर मे पत्नी जी इनके हाथ मे मोबाइल देते हुए बोली “लीजिए आपके मोबाइल मे फेसबुक इन्स्टाल कर दिया है .... अब इसी पर करते रहिए सोशल नेटवर्किंग।“

इति श्री!