शनिवार, 24 दिसंबर 2022

शाम फ़िर तुम याद आये हो

 


आज की शाम फ़िर

तुम याद आये हो

कुछ छुए-अनछुए जज्बात

दिल में उतार लाये हो।

 

य़े पहाडि.यां ये वादियां

मुझसे कुछ कह रही हैं

भावनायें दिल की कुछ

आंसुओं संग बह रही है।

 

कर रहा हूं महसुस खुदको,

फ़िर अकेला असमर्थ कातर;

क्या मिलेंगे कभी मुझे भी ,

प्यार  के कोई  ढाइ आखर?

 

कर रही होगी कहीं तुम,

आज भी अट्खेलियां

घेरे होंगी खुशामद को

सारी सखी-सहेलियां।

 

अपने तब्बस्सुम से जहां को

यूं ही आफ़ताब करते रहना

हो सके तो मुझ अदना के

जीवन में भी रंग भरना !!

गुरुवार, 22 दिसंबर 2022

मन की अभिलाषायें


 

गर देखनी हो तनहाइयां

तो दिल मे मेरे झांक लो

हो पैमाना तेरे पास तो,

दर्द मेरा आंक लो

इन पहाड़ों में कहीं पिस रही

मन की अभिलाषायें कई

चढ कर उपर लुढक जाती हैं

मन की आशाएं कई

ये खेत हैं कपास के,

या जैसे स्वयं मैं हीं हूं

पक कर भी स्वेतवर्णिय

उडने को बस तैयार हूं

पर जो है बागवां मेरा

बांधना है मुझको चाहता

ढंकने समाज की नग्नता,

मुझको लुटाना चाहता

जाने उन्हे क्या प्रिय है

अभिलाषा मेरी, या समाज की

यह चिरप्रतीक्षित प्रश्न है

या बस समस्या आज की

जो भी हो, अंतिम पंख तक

उड़ने की चाहत मन मे है

जो वक्त हो तो देख लेना

ये द्वंद तो जीवन मे है !!

-       15 नवंबर 2011

बुधवार, 21 दिसंबर 2022

जद्दोजहद

 

यह तेरा है, यह मेरा है

यही सबसे बड़ा बखेड़ा है

गृहस्थों का जो घर है,

साधुओं का वह डेरा है।

 

आज नहीं तो कल,

मरना सबको बेरमबेरा है

पूजे जाते हैं दौलतमंद यहाँ

मुफ़लिसों को कब किसने टेरा है!

 

समझते हैं लोग गरीब-नवाज़ जिसको

निकलता अक्सर वही बड़ा लुटेरा है

बिकने आए हम भी दौलत की बाजार मे

खरीदार यहाँ भी कोई नहीं मेरा है ।  

 

जिंदगी की जद्दोजहद और आदमी

हर जगह इन्सानों का रेलमपेला है

करता हैं किसी के वास्ते गुस्ताखियाँ कई

पाता है सजा-मुकर्रर मगर अकेला है। 

 

क्यूँ घबराते हो तुम इनसान अँधेरों से इतना

काली रात के बाद फिर से नया सवेरा है ।

सच कहता हूँ सुन लो सियाराम की कसम

दुआओं मे प्रणव की सदा सबका बसेरा है ।