गुरुवार, 18 जुलाई 2024

द्वादश निदान [मूल मैथिली कथा। लेखक : हरिमोहन झा अनुवादक: प्रणव झा]

द्वादश निदान

लेखक : हरिमोहन झा  अनुवादक: प्रणव झा  (केवल अकादमिक एवं शोध कार्य हेतु)

उस दिन जनता के कल्याण पर विचार करने हेतु एक उच्चस्तरीय समिति बैठी थी। दूर-दूर से सदस्यगण आए थे। एक सज्जन बोले - सभी अनर्थ की जड़ है ये महंगाई। मुद्रास्फीति के  कारण वस्तु का दाम नित्य प्रतिदिन बढता जा रहा है। जबतक यह मूल्यवृद्धि नहीं रोकी जाएगी तब तक लोगों का कल्याण नहीं। इसीलिए मेरा विचार है कि सर्वप्रथम चोरबाजारी और भ्रष्टाचार का उन्मूलन किया जाए।

दूसरे व्यक्ति ने कहा कैसे किया जाए? छोटे चोरों  को पकड़ने का जिम्मा जिसपर है वह स्वयं बड़ा चोर है। इचना-पोठिया के ऊपर रहु-भाकुड़ बैठे हैं। यह मत्स्य-न्याय समस्त देश मे फैला हुआ है। नीचे से ऊपर तक। ऐसी स्थिति मे भ्रष्टाचार कैसे दूर हो सकता है? इसीलिए मेरा विचार है कि  सर्वप्रथम राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण होना आवश्यक है।

तीसरे व्यक्ति ने कहा चरित्र का निर्माण कौन करेगा?  'स्वयासिद्धः कथं परान् साधयति! केवल नैतिकता का उपदेश देने से कोई फल नहीं। जब तक कठोर से कठोर दंड-विधान नहीं होगा तबतक भ्रष्टाचार दूर नहीं होगा। 'बिना भय होहि प्रीति।'

चौथे व्यक्ति ने कहा -दण्ड-विधान तो है ही। किन्तु वो कार्यान्वित कहाँ होता है? इसके लिए प्रशासन-यंत्र मे दृढता लाना चाहिए। जमाखोरी और मिलावट करनेवलों को ऐसी सजा दी जाए कि फिर किसी को साहस न हो।

पांचवे व्यक्ति ने कहा - केवल कानूनी दण्ड से  काम नहीं चलेगा। भ्रष्टाचार का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए। यदि समाज मे ऐसी चेतना जग जाए, तभी भ्रष्टाचार दूर हो सकता है।

छठवे व्यक्ति ने कहा -केवल भ्रष्टाचार ही हटाने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। जबतक उत्पादन मे वृद्धि नहीं होगा तबतक वस्तु सुलभ नहीं होगा। इसीलिए हमलोगों को चाहिए कि  अधिक से अधिक उत्पादन करने मे समस्त शक्ति लगा दें।

सातवें व्यक्ति बोले - केवल उत्पाद ही  बढ़ाने से काम नहीं चलेगा। देश की जनसंख्या भयंकर रूप से  बढ़ती जा रही है। इतना सारा मुँह भरा कैसे जाए? एक अनार, हजार बीमार। तब ऊंट के मुँह मे जीरा से क्या होगा? इसीलिए मेरा विचार है कि  युद्धस्तर पर परिवार-नियोजन का अभियान चलाया जाए।

आठवें व्यक्ति ने कहा - केवल सरकारी ढोल पिटने से गर्भाधान नहि रुक सकता है। स्त्री-पुरुष स्वेच्छा से इन्द्रियसंयम का अभ्यास करें, तब जाकर संतति-निरोध हो सकता है। इसीलिए मेरा विचार है कि  ब्रह्मचर्य-शिक्षा पर जोर दिया जाए।

नवम व्यक्ति बोले देश मे वीर नागरिक हो तब राष्ट्र सबल हो सकता है। जो पौष्टिक आहार के बिना नहीं हो सकता है। इसी लिए मेरा विचार है कि प्रत्येक व्यक्ति के हेतु उचित मात्रा मे शुद्ध दूध की व्यवस्था हो।

दसवें व्यक्ति बोले - जहाँ अन्न ही दुर्लभ हो वहाँ शुद्ध दूध सभी को कैसे मिलेगा? चारा के  अभावमे लाचार हो गए लोग गाय पालना छोड़ रहे हैं। गोरस सूखा जा रहा है। इसीलिए मेरा विचार है कि कृषि और पशुपालन पर सब से अधिक ध्यान दिया जाए।

ग्यारहवें व्यक्ति ने बोला - परंतु खाद, बीज, जोताइ और सिंचाइ का साधन इतना कठिन हो गाय है कि खेतिहर सब रो रहे हैं। उसपर से साल दर साल यह भीषण बाढ़ आने से सरकारी रिलीफ बाँटनेवाले अफसर का तोंद और ज्यादा फूलता जा रहा है एंटिकरप्सन डिपार्टमेण्ट को और अधिक सक्रिय बनाना चाहिए।

बारहवें व्यक्ति ने कहा - किन्तु खैरात पर ही जनता किनते दिन खेपेगी? आत्मनिर्भरता होना बहुत जरूरी है। गरीबी और बेरोजगारी दूर होना चाहिए शिक्षा मे आमूल परिवर्त्तन होना चाहिए। उद्योग-व्यवसाय की वृद्धि होना चाहिए 'पर-कैपिटा' आमदनी बढ़ना चाहिए अभी लाखो लाख ऐसे व्यक्ति हैं जिनको बाजरे की रोटी मिलना कठिन है इसीलिए सरकारे को चाहिए कि विलासिता और फिजूलखर्ची पर कड़ा रोक लगा दें

सभाध्यक्ष के इस भाषण के समर्थन मे जोर से करतल घ्वनि-हुआ

तबतक भोजन का समय हो गया था

सेक्रेटरी टेबल पर की घंटी बजा दिए तत्क्षण सभी के आगे मे चाय, कटलेट, करी, पोलाव, केक, फुडिंग, रसमलाइ और आइसक्रीम का ढेर लग गया सदस्य लोग जनता के असीम कष्ट से करुणार्द्र चित्त होते हुए भोजन मे दत्तचित्त हो गए

तदनन्तर रुमाल से हाथ मूँह पोछ कर सभी लोग 'बिल-फार्म' पर अपने-अपने यात्रा-भत्ता का हिसाब जोड़ आफिस के किरानी के हाथ मे थम्हा दिए, जिसकी कुल राशि दो हजार रुपए हुए सदस्यगण का सम्मिलित विचार हुआ कि एक दिन मे तो सभी समस्या का समाधान होना असंभव है, इसीलिए पुनः अग्रिम बैठक मे सुभ्यस्त होकर विस्तार पूर्वक विचार किया जाए पन्द्रह दिन के भीतरे दूसरी तिथि निर्धारित किया गया तदुपरान्त सभी लोग चुरुट पीते हुए अपने-अपने कार मे जा बैठे

(एकादशी' से)

मूल टेक्स्ट अगले पृष्ठ पर

द्वादश निदान बीछल कथा

लेखक : हरिमोहन झा  अनुवाद : प्रणव झा

ओहि दिन जनताक कल्याणपर विचार करबाक हेतु एक उच्चस्तरीय समिति बैसल छ्ल। दूर-दूरसॅं सदस्यगण आयल छलाह। एक सज्जन बजलाह-सभ अनर्थक जड़ि थिक ई महगी। मुद्रास्फीतिक कारण वस्तुक दाम नित्य प्रति बढल जाइत अछि। जावत धरि ई मूल्यवृद्धि नहि रोकल जायत तावत लोकक कल्याण नहि। तैं हमर विचार जे सर्वप्रथम चोरबजार आ भ्रष्टाचारक उन्मूलन कयल जाय।

दोसर गोटा कहलथिन्ह-कोना कयल जाय? छोटका चोरकें पकड़बाक भार जकरापर छैक से बड़का चोर अछि। इचना-पोठियाक ऊपर रऽहु-भाकुड़ बैसल अछि। ई मत्स्य-न्याय समस्त देशमे पसरल अछि। नीचाँसॅं ऊपर धरि। एहना स्थितिमे भ्रष्टाचार कोना दूर भऽ सकैत अछि? तैं हमर विचार जे सर्वप्रथम राष्ट्रीय चरित्रक निर्माण हैब आवश्यक अछि।

तेसर गोटा बजलाह-चरित्रक निर्माण के करत? 'स्वयासिद्धः कथं परान् साधयति! केवल नैतिकताक उपदेश देने कोनो फल नहि। जावत कठोरसॅं कठोर दंड-विधान नहि हैतैक तावत भ्रष्टाचार दूर नहि हैत। 'बिनू भय होहि न प्रीति।'

चारिम गोटा बजलाह-दण्ड-विधान तॅं छैके। किन्तु ओ कार्यान्वित कहाँ होइत अछि? एहि खातिर प्रशासन-यंत्रमे दृढता अनबाक चाही। जमाखोरी आ मिलावट करऽवला कें तेहन सजाय देल जाइक जे फेर ककरो साहस नहि होइक।

पाँचम गोटा कहलथिन्ह-केवल कानूनी दण्डसॅं काज नहि चलतैक। भ्रष्टाचारीक सामाजिक बहिष्कार हैबाक चाही। यदि समाजमे एहन चेतना जागि जाइक, तैखन भ्रष्टाचार दूर भऽ सकैत अछि।

छठम गोटा कहलथिन्ह-केवल भ्रष्टाचारे हॅंटने समस्याक समाधान नहि भऽ सकत। जावत उत्पादनमे वृद्धि नहि हैत तावत वस्तु सुलभ नहि हैत। तैं हमरा सभकें चाही जे अधिकसॅं अधिक उत्पादन करबामे समस्त शक्ति लगा दी।

सातम गोटा बजलाह-केवल उत्पादने बढौलासॅं काज नहि चलत। देशक जनसंख्या भयंकर रूपसॅं बढल जा रहल अछि। एतेक रास मुँह भरल कोना जायत? एक अनार, हजार बीमार। तखन ऊँटक मुँहमे जीरक फोरनसॅं की हैतैक? तैं हमर विचार जे युद्धस्तर पर परिवार-नियोजनक अभियान चलाओल जाय।

आठम गोटा कहलथिन्ह-केवल सरकारी ढोल पिटने गर्भाधान नहि रुकि सकैत अछि। स्त्री-पुरुष स्वेच्छा इन्द्रियसंयमक अभ्यास करथि, तैखन संतति-निरोध भऽ सकैछ। तैं हमर बिचार जे ब्रह्मचर्य-शिक्षापर जोर देल जाय।

नवम गोटा बजलाह-देशमे वीर नागरिक हो तखन राष्ट्र सबल भऽ सकैत अछि। से पौष्टिक आहार वेत्रेक नहि भऽ सकैत छैक। तैं हमर विचार जे प्रत्येक व्यक्तिक हेतु उचित मात्रामे शुद्ध दूधक व्यवस्था हो।

दसम गोटा बजलाह-जहाँ अन्ने दुर्लभ तहाँ शुद्ध दूध सभकें कहाँसॅं भेटतैक? चाराक अभावमे नचार भऽ लोक गाय पोसनाइ छोड़ि रहल अछि। गोरस सुखायल जा रहल अछि। तैं हमर विचार जे कृषि और पशुपालन पर सभ सॅं अधिक ध्यान देल जाय ।

एगारहम गोटा बजलाह - परंच खाद, बीज, जोताइ और सिंचाइक साधन ततेक कठिन भऽ गेल छैक जे खेतिहर सभ कानि रहल अछि । ताहि पर साले साल ई भीषण बाढ़ि आ सरकारी रिलीफ बाँटऽवला अफसरक धोधि और बेसी फूलल जा रहल छनि । एंटिकरप्सन डिपार्टमेण्ट कैं और अधिक सक्रिय बनैबाक चाही ।

बारहम गोटा कहलथिन्ह - किन्तु खैराते पर जनता कतेक दिन खेपत ? आत्मनिर्भरता हैब बहुत जरूरी छैक । गरीबी आ बेरोजगारी दूर हैबाक चाही । शिक्षा मे आमूल परिवर्त्तन हैबाक चाही । उद्योग-व्यवसायक वृद्धि हैबाक चाही । 'पर-कैपिटा' आमदनी बढ़बाक चाही । एखन लाखक लाख एहन व्यक्ति अछि जेकरा जनेरोक रोटी भेटब कठिन छैक । तैं सरकारे कैं चाही जे विलासिता आ फिजूलखर्ची पर कड़ा रोक लगा देअए ।

सभाध्यक्षक एहि भाषणक समर्थन मे जोर सॅं करतल घ्वनि-भेल ।

तावत लंच टाइम भऽ गेलैक ।

सेक्रेटरी टेबुलपरक घंटी बजा देलथिन । तत्क्षण सभक आगाँ मे चाय, कटलेट, करी, पोलाव, केक, फुडिंग, रसमलाइ आ आइसक्रीमक पथार लागि गेलनि । सदस्य लोकनि जनताक असीम कष्ट सॅं करुणार्द्र चित्त होइत भोजन मे दत्तचित्त भऽ गेलाह ।

तदनन्तर रुमाल सॅं हाथ मूँह पोछि सभ गोटे 'बिल-फार्म' पर अपन-अपन यात्रा-भत्ताक हिसाब जोड़ि आफिसक किरानीक हाथ मे थम्हा देलथिन, जकर कुल राशि दू सहस्र टाका भेलैन्ह । सदस्यगणक सम्मिलित विचार भेलैन्ह जे एक दिन मे त सभ समस्या कें समाधान हैब असंभव, तैं पुनः अग्रिम बैसक मे सुभ्यस्त भऽ विस्तार पूर्वक विचार कैल जाय । पन्द्रह दिनक भीतरे दोसर तिथि निर्धारित कैल गेल । तदुपरान्त सभ गोटे चुरुट पिबैत अपन-अपन कार मे जा बैसलाह ।

(एकादशी' सॅं )

 

मंगलवार, 16 जुलाई 2024

नरेंद्र झा : सीए, मैथिल आर्थिक-सामाजिक लेखक आ मिथिला अभियानी

 

सीए नरेंद्र झा के नाम मिथिला आ मैथिली के लेल समर्पित एकटा एहेन लोक के रूप में लेल जा सकय अछि  जिनकर लेखनी अङ्ग्रेज़ी आ मैथिली भाषा के माध्यम से मिथिला के संप्रति ज्वलंत समस्या सभ के  उठेलक अछि। एकटा चार्टर्ड अकाउंटेंट होय के संग संग ओ मिथिला के इतिहास, संस्कृति आ आर्थिक विकास के प्रबल पक्षधर रहलाह अछि।

हुनकर चर्चित पुस्तक "मिथिला राइजिंग" मिथिलांचल के सर्वांगीण विकास आ ऐ क्षेत्र के एकटा अलग राज्य के रूप में स्थापित करबाक मांग के बुलंद करईत अछि। पुस्तक में श्री नरेंद्र झा  ऐ बात पर विस्तार से प्रकाश देने छैथ कि कै तरहें लगातार उपेक्षा के कारण मिथिला विकास के रेस मे पिछड़ल अछि आ एकटा अलग राज्य बनने कै प्रकार से ऐ क्षेत्र के विकास हेतय आ मिथिला कै प्रकार से  राष्ट्र निर्माण में सेहो अपन महत्वपूर्ण योगदान द सकय अछि।

नरेंद्र झा जी क जन्म 1934 में दरभंगा जिला के तरौनी  गाम मे भेल छल। तरौनी संजोग से हमर मातृक सेहो अछि। ई गांव संस्कृत अध्ययन के एकटा प्राचीन केंद्र रहल अछि। हुनकर  पिताजी विद्यावाचस्पति पंडित उपेंद्र झा  सेहो एकटा उद्भट संस्कृत विद्वान छलाह जिनका राष्ट्रपति पुरस्कार से सेहो सम्मानित कैल गेल छल। ऐ गाम से कैएक टा उद्भट विद्वान बहरायल छैथ।  एहन वातावरण में पलल-बढ़ल नरेंद्र जी के मिथिलाक समृद्ध परंपरा विरासत में भेंटल छल । यैह कारण छैक जे हुनकर लेखन में मिथिला क्षेत्र के उत्थानक गहिर संदेश निहित रहल अछि।

अपन शिक्षा गांव से शुरू केला के बाद ओ उच्च शिक्षा के लेल दरभंगा एलाह आ फेर कलकत्ता में चार्टर्ड अकाउंटेंट बनए लेल गेलाह। कलकत्ता में 10 साल तक अभ्यास करबाक पश्चात ओ 1975 में पटना आबि गेलाह। ओ  1996 मे इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया के पटना शाखा के अध्यक्ष सेहो  बनल छलाह।

मिथिला-मैथिली के काज मे श्री नरेंद्र झा जी 1954 से लागि गेल छलाह जखन ओ इंटर कॉमर्स के परीक्षा पास केने छलाह। एही काज के लेल हुनका डॉ० लक्ष्मण झा आ डॉ० लक्ष्मीनारायण सिंह सन दिग्गज के सान्निध्य आ हुनका से प्रेरणा भेटल छल। बक़ौल श्री नरेंद्र झा, डॉ० लक्ष्मण झा के नेतृत्व मे पाया आंदोलन हुनकर पहिल सामाजिक आंदोलन छल। 1956 मे जखन ओ कलकत्ता सीए के पढ़ाई लेल गेल छलाह त ओत्त हुनका प्रो० प्रबोध नारायण सिंह के सानिध्य प्राप्त भेल छल जिनका संपर्क मे श्री झा के अंदर मिथिला-मैथिली के प्रति समर्पण आर दृढ़ भेल छल। कलकत्ता मे बंग भाषी सब के अपन भाषा के प्रति प्रेम आ सम्मान देख हिनका भीतर मातृभाषा मैथिली के प्रति प्रेम आर बेसिए उत्कट भेल छल ।

मैंथिली एकटा प्राचीन आ स्वयं मे एकटा समृद्ध भाषा छैक। वाजपेयी जी के सरकार मे एकरा संविधान के आठम सूची मे सेहो समाहित क लेल गेल। तथापि मैथिली मे लिखल छपल कदाचित आन आन भारतीय भाषा से कम जाय अछि। कदाचित शब्द के प्रयोग ऐ दुआरे कैल जे भ सकय अछि जे ई बात गलत सेहो होय। किएकि हमरा अपना देखबा मे रहल अछि जे बहुत रास किताब अलग अलग विषय मे या साहित्य कविता, कथा , उपन्यास आदि छपल त अछि मुदा कतौ गुमनामी मे हेरा के रहि गेल अछि। एकर मूल कारण जे हमरा बुझना जाय अछि से अछि i) देश के औसत के तुलना मे मिथिला मे साक्षारता व पढ़ाई (खास क इंटर पास) के कमी ii) गरीबी, जै कारण पोथी किनबाक आदत लोक के बनिए नै पाबय छय iii) मिथिला क्षेत्र मे सरकारी या प्राइभेट पुस्तकालय के आभाव। एना मे अक्सर होइत छैक जे कोनो विशिष्ट विषय पर मैथिली मे लेखन के अभाव छैक। जेना मानि लिय जे स्वातंत्र्योत्तर मिथिला के आर्थिक-सामाजिक विषय पर हमरे चाहे आरो कियौ लोक के मोन मे भ सकय अछि जे पुस्तक के अभाव छैक। मुदा जखन आशीष जी आ विदेह के पेटार उनटाओल त देखल जे नरेंद्र झा नाम केर एकटा चार्टर्ड एकाउंटेंट 60-70 के दशके से ऐ सभ विषय पर मैथिली मे लिखनाइ आ सामाजिक परिचर्चा शुरू क देने छलाह। 90 आ 2000 के दशक के मिथिला के आर्थिक राजनैतिक  पहलू पर खोइया-खोइया छोड़ा छोड़ा के लिखने छईथ। मिथिला के भोगौलीक, आर्थिक आ समसामयिक सामाजिक बुनावट के विस्तार पूर्वक लिखल । बक़ौल आशीष अनचिन्हार “नरेंद्र झा आधुनिक मैथिली के प्रथम आर्थिक लेखक थिकाह।“

कोनो राज्य के लेल सबसे महत्वपूर्ण बात ई होइत छैक जे ओ आर्थिक रूप से कतेक सुदृढ़ अछि आ ओतय रहनियार लोक सब कतेक सुख-सुविधा आ अधिकार के भोग करय छैथ। पिछला दसेक वर्ष से मिथिला राज्य के मांग ज़ोर पकड़ि रहल अछिल। भ सकय अछि जे भविष्य मे देर-सवेर मिथिला सेहो एकटा अलग राज्य बनि जाय। मुदा अलग राज्य ओतेक बड़का बात नै हेतइक जते कि मिथिला के आत्मनिर्भर आ सुखी-सम्पन्न राज्य बनायाब। ई काज बिना सुविचारित आर्थिक नीति आ उपलब्ध संसाधनक समुचित उपयोग के संभव नै भ सकय अछि। आ ताहि लेल आवश्यक अछि जे सरकार आ मिथिला मे कार्यरत उद्यमी, नेता, सामाजसेवी आ सरकारी कार्मिक सभ के ऐ क्षेत्र के नदी, खेत, उद्योग, सामाजिक व्यवस्था आदि के निक ज्ञान होय। मिथिला मे नदी तंत्र के एकटा जाल बुनल छैक। आ प्राचीन काल से ई ऐ क्षेत्र के समृद्धि आ विपत्ति दुनु के कारण रहल अछि। इतिहास मे जै काल मे लोक-समाज  ऐ तंत्र के समझ बना के एकर सदुपयोग केलक लोक के समृद्धि भेटल आ नै त नदी के बाढि के रूप मे विपत्ति। मिथिला के नदी तंत्र के विषय मे हमरा विस्तृत जनतब सबसे पहिले श्री दिनेश मिश्र द्वारा हिंदी भाषा मे लिखल किताब सब के मार्फत भेल छल, जेकर बाद मे श्री गजेन्द्र ठाकुर द्वारा मैथिली रूपान्तरण सभ सेहो विदेह मे पढल। हम जखन नरेंद्र जी के पुस्तक पढलहु त ज्ञात भेल जे मिथिला मे जल-संसाधन एवं प्रबंधन” आ “मिथिला के आर्थिक विकास” नाम के पुस्तक मे नै खाली मिथिला के नदी तंत्र के विस्तृत विवरण मैथिली भाषा मे देने छथीन अपितु समकालीन जिलावार आर्थिक व्यवस्था, भौगोलिक आ सामाजिक स्थिति के सेहो  विस्तार से चर्चा केने छथीन। निश्चिते एतेक लिखबा के लेल अपन सीए के पेशा से कतेक रास समय निकालि के रिसर्च केने हेता से हुनकर मिथिला क्षेत्र आ मैथिली भाषा आ ऐ विषय के प्रति प्रेम आ लगाव के निर्धारित करय अछि।

एकटा वस्तु जे हम आई के समय के बहुत रास मैथिल युवा मे देख रहल छी, जे किछु युवा जतय राजनैतिक रूप से सक्रिय भ मिथिला के विकास के संभावना खोजि रहल छैथ ओतय किछु उद्यमी आ औंटरप्रेन्योर मानसिकता बला मैथिल युवा आ अनुभवी लोक सब सेहो मिथिला के विभिन क्षेत्र मे सक्रियता से कृषि, कुटीरउद्योग आ तकनीकी आधारित कारोबार ठाढ़ करबा के प्रयास मे छैथ। हमर विशेषज्ञता नै राजनीति मे अछि आ नै व्यापार मे। मुदा अपन सैद्धान्तिक ज्ञान आ अनुभव के आधार पर हमर मानब अछि जे ई दुनु माध्यम मे अपन आ क्षेत्र के प्रगति के लेल काज कर के इच्छुक लोक के लेल ई आवश्यक अछि जे क्षेत्र के इतिहास(आर्थिक आ सामाजिक परिप्रेक्ष्य मे), भूगोल, संसाधन आ तंत्र के विषय मे ठीक-ठाक समझ बना ली। तखने राजनीति आ कि उद्यम व्यापार के माध्यम से विकास के पथ पर अग्रसर भ सकय छी। आ हम अपन पाठकीय अनुभव के आधार पर कहि सकय छी जे ऐ के लेल नरेंद्र झा द्वारा लिखल उपरोक्त दू टा पोथी के अतिरिक्त “मिथिला के जनपदीय विकास” आ “विकास ओ अर्थतन्त्र” के अध्ययन करबा के चाहिएन। ओना ऐ तरहक सामाग्री अङ्ग्रेज़ी मे सेहो भेट जेतईन (स्वयं नरेंद्र झा के सेहो साहित्य अङ्ग्रेज़ी मे उपलब्ध अछि), कदाचित हिंदी मे सेहो, मुदा जखन मातृभाषा मैथिली मे लोक ऐ प्रकार के सामाग्री के अध्ययन के लेल अग्रसर हेता त भाषा के रूप मे मैथिली के सेहो विकास हेतय आ मैथिली मे अध्ययन से मिथिला के प्रति भावनात्मक लगाव मे सेहो वृद्धि संभव छैक। श्री झा के लेखनी मे नै खाली भारतक सीमा क्षेत्र के मिथिला के भूगोल, सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक परिस्थिति के चर्चा कैल गेल छैक अपितु नेपाल के अंतर्गत आबय बला मिथिला के विषय मे सेहो सारगर्भित आलेख उपलब्ध छैक।

अंतिका प्रकाशन से 2008 मे छपल हुनकर पुस्तक “विकास ओ अर्थतन्त्र” जेकरा ओ मैथिली आंदोलन आ सांस्कृतिक आलोड़न स सक्रिय रूप स सम्बद्ध आंदोलनकर्मी आ रंगकर्मी के समर्पित केने छैथ के चारि भाग मे विभक्त कय लिखने छैथ – “मिथिला: राज्य ओ राजनीति” , “मिथिला क विकास मार्ग” “अर्थतन्त्र” आ “स्मृत शेष” ऐ मोट-मोट विषय  के अंतर्गत 90 आ 2000 के दशक के बीच के मिथिला के राजनीति अर्थतन्त्र आ विकास पर लिखल सारगर्भित लेख पठनीय अछि आ आजुक संदर्भ मे सेहो बहुत बात मे प्रासांगित। ऐ पुस्तक मे 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव के मिथिला के एक एक सीट के केंडीडेट आ परिस्थिति के विस्तार से वर्णन केने छैथ जे हुनक ऐ संदर्भ मे पकड़ के द्योतक अछि ।

विदेह जून 2024 के अंक श्री नरेंद्र झा विशेषांक के रूप मे प्रकाशित करबाक नियारलक अछि ई स्वागत योग्य बात अछि। एही प्रकार के क्रियाकलाप से मैथिली लिखित साहित्य के पोखड़ि मे हेरायल नुकायल लेखन सभ पर प्रकाश खसय छैक जै से नै खाली हमरा सन पाठक सब के नब नब विषय पर मैथिली साहित्य पढ़बाक प्रेरणा भेटय छैक अपितु भविष्य के पाठक लेल सेहो मैथिली साहित्य के पेटार के मुँह फुजई छैक। आ सबसे बेसी बढि क ई बात जे आर्थव्यवस्था, उद्योग, विज्ञान, तकनीकी आदि विषय पर लोक के मैथिली मे पढबा-लिखबाक प्रेरणा सेहो भेटय छै जै से कि मैथिली भाषा आ ओकर साहित्य सेहो समय के संग संग समृद्ध हेतैक। विदेह के संपादक मण्डल आ पाठकगण के श्री नरेंद्र झा विशेषांक के लेक बहुत रास बधाई आ शुभकामना ।

प्रणव झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली  (14.05.2024)

पोथी चर्चा : “प्रीति कारण सेतु बान्हल”: सम्पादक - श्री अशीष अनचिन्हार

 प्रीति कारण सेतु बान्हल” पोथी श्री आशीष अनचिन्हार के संपादन मे प्रकाशित पोथी छैक जै मे वर्तमान मैथिली साहित्य जगत के दीप्तिमान स्तम्भ दंपत्ति श्री गजेन्द्र ठाकुर आ श्रीमती प्रीति ठाकुर केर मैथिली साहित्य जगत के लेल कैल गेल योगदान आ पुरातन मैथिली विवाह आ पंजी पद्धति के संरक्षण एवं संवर्धन लेल कैल गेल प्रयास आ योगदान पर प्रकाश देल गेल अछि। कुल 478 पृष्ठ के एहि पुस्तक मे 32 टा सहयोगी लेखक सबहक आलेख, संस्मरण, साक्षात्कार, आलोचना आदि छैक जे संप्रति  साहित्य, इतिहास, पत्रकारिता एवं अन्य विधा सँ जुड़ल छैथ। जेना छोट-पैघ बहुते रास नदी सभ मिलि कय समुद्रक निर्माण केने होय। ऐ मे से कै टा त संप्रति मैथिली साहित्य जगत के जनल मनल हस्ताक्षर छैथ।  

पोथी केर विषय-वस्तु के मोट मोट तीन वर्ग मे हम वर्गीकृत करय चाहब : - i) श्री गजेन्द्र आ श्रीमती प्रीति ठाकुर केर पारिवारिक जीवन के गाथा आ ओय सब से जुड़ल संस्मरण आदि। ii) ऐ साहित्यकार द्वय के द्वारा मैथिली साहित्य एवं मैथिल संस्कृति के द्योतक कागजात सबहक अनुवाद आ डिजिटाईजेशन के अति महत्वपूर्ण काज मे योगदान आ ओकर यात्रा केर गाथा आ iii) साहित्यकार द्वय द्वारा कैल गेल काज सबहक विषय जेना पंजी प्रणाली आदि संबन्धित विषय सब पर आलेख आ चर्चा ।

ऐ पुस्तक के विभिन्न खंड एवं विषय सूची के शीर्षक केर रूप मे विभिन्न पारंपरिक लोकगीत सबहक पंक्ति देल गेल अछि जेना “आजु जनकपुर मंगल भुप सभ आओल हे…”। संप्रति हिंदी कथा लेखन विधा मे सत्य व्यास के लेखन मे सेहो एहन प्रयोग भेटईत छैक। ऐ तरहक प्रयोग पाठक मे विषय-वस्तु आ पोथी  के ल क जिज्ञासा बढ़ाबै छैक।

अलग अलग सहयोगी लेखक द्वारा अपन-अपन शैली में उपरोक्त तीन टा मे से कोनो एक वा एक से बेसी वर्ग मे आलेख लिखल गेल अछि जे साहित्यकार द्वय के सम्पूर्ण बेक्तिगत आ साहित्यक जीवन के विभिन्न पहलू के समावेशित करय अछि। लेख पढ़ई काल पाठक  के रूप मे कतेक रास नव-पुरान संदर्भ सभ मस्तिष्क के सोझा उपस्थित भ जाइत छैक। संगहि मैथिल ब्राह्मण पंजी प्रथा जेहन विषय के प्रति जिज्ञासा आ कम से कम ऐ विषय पर सतही ज्ञान के संचार सेहो।

आशीष अनचिनहार आ मुन्ना जी आदि द्वारा साहित्यकार द्वय के साक्षात्कार हुनक मनोवृति आ हुनक काज मे बेक्तिगत रुचि आदि मे जानय के अवसर दैत छैक। किछू लेखक अपन संस्मरण द्वारा श्री गजेन्द्र ठाकुर के पारिवारिक जीवन के सेहो निक चित्र झीकने छैथ आ पाठक के ओहि संबंध मे रोचक जानकारी प्राप्त करबा मे सक्षम बनाबै छैथ।

आन आन आलेख, संस्मरण आ साक्षात्कार के अतिरिक्त श्री जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल आ डॉ० कैलाश कुमार मिश्र द्वारा मिथिला पंजी प्रबंध पर लिखल आलेख पाठक केर रूप मे हमरा लेल बेक्तिगत रूप से खूब रुचिगर आ उपयोगी लागल। सुश्री कल्पना झा के आलेख सेहो मोन के छुलक आ गुदगुदेलक। एकठाम ओ कहय छैथ जे एकटा उमैर भेला पर किताब कीनैत डर होई छैन्ह जे नव पीढ़ी कहाँ कहियो ओय पोथी के उल्टेतै पलटतै। उल्टे दुनियाँ से बिदा भेला पर भ सकय अछि जे हुनका उपराग दैन जे ई की जमा क के ध गेलिह अछि। मुदा हमर ऐ विषय मे सोचनाइ अलग अछि आ जे कि हमर अपन अनुभव के आधार पर अछि। हमर बाबा जे की संस्कृत के विद्वान छलाह आ एकटा ठाकुरबारी मे पुरोहित। हम जखन नेने छलहु 9-10 वर्ष के तखने स्वर्गवासी भ गेल छलाह। हमरा याद अछि हुनक पेटारा मे बोरा के बोरा भरि भरि के आध्यात्म आ धर्म-संस्कृत केर पोथी सभ छलईन्ह। सभ किताब के हमर कक्का कबाड़ी मे बेच देलखिन मुदा किछु कल्याण विशेषांक, गीता आ पुराण हम छाँटि नेने रही (ओहि समय मे पुस्तक मे देल गेल फोटो सबहक लोभे) । बाद मे नहु नहु ओई पोथी सभ के पढ़ईत गेलहु त ओई सब मे हमरा रुचि आबय लागल। ओई समय मे हमर विचार-व्यवहार आ धर्म-कर्म मे हमर रुचि के आकार देबय मे ओय पुस्तक सबहक हम महत्वपूर्ण योगदान देखय छी। पितिया लगा के हम 7 भाई बहिन मे हमरे टा ओई पोथी सभ पर मोन गेल छल। अर्थात प्रोबेबलिटी त ओत्तौ 1/7ते छलई। ताहि लेल हमर ई विचार अछि जे जखन हम कथा या कथेतर के रूप मे किछु विचार-संस्कार अथवा किछु सूचना पोथी के आकार मे संरक्षित करय छी, त कम्मे प्रोबेबलिटी सही मुदा किछ न किछ चांस रहय छै जे अगिला पीढ़ी तक ओ  विचार-संस्कार आ सूचना पहुंचय। ई पोथी सेहो एकटा कथेतर साहित्य छैक जै मे विषय पर किछु रोचक लेख त छैक तथापि विषक के गूढ़ता के कारण सब प्रकार के पाठक लेल मनोरंजक होय ई आवश्यक नहि। मुदा पुस्तक मे देल सूचना मैथिली साहित्य जगत एवं मैथिल संस्कृति दुनु के लेल संरक्षणीय छैक। ताहि लेल ऐ प्रकार के पोथी के संकल्पना संयोजन एवं सम्पादन लेल श्री आशीष अनचिन्हार जी बधाई, प्रशंसा आ साधुवाद के पात्र छईथ। मिथिला आ मैथिली से संबन्धित संस्था, कॉलेज आदि के पुस्तकालय मे ऐ तरहक पुस्तक के संग्रह हेबाक चाहिए।

भौतिक रूप से सेहो पोथी नीक बनल अछि। पोथी केर कवर पेज, एकर कागत केर क्वालिटी, फॉण्ट, फॉण्ट साइज़, मुख्य आवरण आ पृष्ठ पेज केर रंग संयोजन, डिज़ाइन, फॉरमेट आदि नीक गुणवत्ता के बनल अछि जे पाठक के हाथ मे ल क पढ़े मे एकटा सुखदगर अनुभव कराबय छैक। पोथी डॉट कॉम के एकरा लेल सराहना कैल जा सकय अछि। पुनः ऐ पोथी लेल श्री आशीष अनचिन्हार जी, श्री गजेन्द्र ठाकुर जी आ श्रीमती प्रीति ठाकुर जी के खूब रास बधाई।

(08.04.2024)