गुरुवार, 20 मार्च 2025

आशाक आकाश

 

आशाक आकाश

 

सून्न आँखि मे आब तऽ अबैतो नहिं अछि नीर,
के सुनत, केकरा कहू हम अपन मोनक पीर?

आशाक दीप जरैत रहय छल कहियो जे निशि-दिन,
मिझा गेल मोनक आँगन मे , भेल मलिन आ क्षीण।

प्राती के जे स्वर उठैत छल हमर मनक मन्दिर मे,
मौन पड़ल अछि कुंठित भऽ कऽ, रुद्ध कंठक स्वर मे।

प्रणय-पुष्प फुलायल छल जे प्रेमक ऋतु बसंत,
पतझर मे ओ झरि गेल अछि, भेल करुणे अंत।

दूर सुनाइ पड़ै अछि  ई केकर करुण रुदन?
किएक राधा केँ जग मे नहि भेटै छथि मदन?

हमर मोनक मूक व्यथा तोरे स्वागत कऽ लय छी,
पीड़क पातक ठाढि के अपन मुट्ठी मे धऽ लय छी ।

मनुष नहिं जे जीबि रहल बस बनि के जिंदा लाश,
घोर निराशा मे सेहो खोजैय ओ आशाक आकाश।

 

सोमवार, 17 मार्च 2025

एक कप चाय

 

एक कप चाय 

 

एक कप चाय तेरे हाथों की

जीवन मे एक नई ताजगी जगा गई

एक कप चाय तेरे हाथों की

मेरे होठों की पुरानी प्यास बुझा गई ।

 

दिल की कोठरी मे फैली थी जो अँधियाली

तेरे नैनों की जादू से वो पल मे जगमगा गई

तेरे चेहरे पर दिखी जो वो प्यारी सी मुस्कान

रक्त कण मे वो बिजली बन कर समा गई

एक कप चाय तेरे हाथों की

जीवन मे एक नई ताजगी जगा गई।

 

सखी! तेरा मुझसे यूं नजरें चुराना

शरमा के मुझसे यूं छुपना रोजाना

दिल मे जाने कितनी छुरियाँ चला गई

एक कप चाय तेरे हाथों की

जीवन मे एक नई ताजगी जगा गई ।

 

चाय की प्याली में छुपे तेरे एहसास,

हर घूँट में पिघलते से हैं मेरे जज़्बात,

सौंधी सी भाप में घुली तेरी ही मिठास,

बहारों में खिलते हों जैसे गुलाब खास।

चाय के साथ तू जाने क्या क्या पिला गई

एक कप चाय तेरे हाथों की,

जीवन में एक नई ताजगी जगा गई।

 

तेरी उँगलियों का हल्का सा स्पर्श,

हौले से कप को थामे वो नर्म स्पर्श,

लगता है जैसे मेरे दिल पर हो अंकित,

एक मधुर सन्देश मुझको सुना गई ।

एक कप चाय तेरे हाथों की,

जीवन में एक नई ताजगी जगा गई।

 

तेरे होठों पर जब चाय का कप ठहरे,

वो सिहरन, वो गर्मी, वो एहसास गहरे,

काश मैं भी उस कप-सा बन जाऊँ,

तेरे होठों से छू कर, तुझमें समाऊँ।

नजरें मिली तो तू फिर शरमा गई

एक कप चाय तेरे हाथों की,

जीवन में एक नई ताजगी जगा गई।

 

साँझ के झरोखों में जब यादें घुलती हैं,

तेरी मुस्कान से फिर रातें महकती हैं,

एक कप चाय और एक मीठी सी बात,

जैसे प्रेम में घुलती हो मधुर सौगात।

हकीकत से होकर ख्वाबों मे आ गई

एक कप चाय तेरे हाथों की,

जीवन में एक नई ताजगी जगा गई।

 

मेरी वफा पर अब तो ऐतबार कर लो

चाल तो पिला दी, अब प्यार कर लो

माना तुम्हारे हैं, कुछ अरमान कुछ आरज़ू

पूरी करूँ तेरे अरमान, बात दिल मे आ गई

एक कप चाय तेरे हाथों की

जीवन मे एक नई ताजगी जगा गई ।

 

-       07.09.2009 [प्रणव झा]

बुधवार, 12 मार्च 2025

दोस्त

 

दोस्त

कभी रूठें कभी मन जाए जो वो दोस्त होते हैं

मुसीबत में तो काम आए जो वो दोस्त होते हैं।

अति है ये कलयुग की, कहावत यूँ भी बन जाए

गज़ब है दोस्ती अब की कमीने दोस्त होते हैं।।


हमारी याद के पेन ड्राइव में बैठे दोस्त होते हैं

तरक्की के अहं में कई बार ऐंठे दोस्त होते हैं।

सुदामा जैसे होती है झिझक मिलनेमें जिससे वो

कन्हैया की तरह के भी तो कोई दोस्त होते हैं।।


सुदामा को मिले मोहन तो ऐसे दोस्त होते हैं

मिले जो कर्ण दुर्योधन तो ऐसे दोस्त होते है।

मिशाल है दोस्ती की कभी केवट और रघुवर

द्रुपद और द्रोण भी तो अक्सर दोस्त होते हैं।।


फकीरी मेंभी दिख जाए, लग जाओ गले झट से

जरुरत पर पुकारे जो तो पहुँच जाओ झटपट से।

अमीरी और गरीबी तो बस हालात के है खेल

कहीं इनसे बहुत बढ़कर हमारे दोस्त होते हैं।।


रविवार, 2 मार्च 2025

जगत के सार हैं मोहन


 जगत के सार हैं मोहन

कभी माता यशोदा के नयन के तार हैं मोहन

वृन्दावन राधिका के हृदय झंकार हैं मोहन।

दिये जो ज्ञान गीता का अभय गाण्डीवधारी को

कराए पार भावसागर, तारणहार है मोहन।।


थिरकते नाग पर यमुनातीर के रखवार हैं मोहन

मधुवन ग्वाल बालों के सखा सरकार हैं मोहन।

किया धारण गोवर्धन को अंगुली पर कभी जिसने

प्रेम धुनमें कभी बंसीवट राधेश्याम हैं मोहन।।


सुदामा के चावल के बदले गए सब हार हैं मोहन

दुर्योधन की मेवा छोड़ खाए विदुर घर साग हैं मोहन।

सिखाया प्रेम दुनियाँ को दिया बस प्रेम को ही भाव

दिया तुलसीको सत्यभामा के धन से अधिक भाव है मोहन।।


वही जो काल के गति का स्वयं आधार रखते हैं

अधर्म का नाश करने को सुदर्शन धार रखते हैं।

रुक्मिणी के मनोहर प्रिय, राधा के प्राणधन हैं

हर युग में धरें अवतार, चिर अविकार हैं मोहन।।


कभी रणछोड़ कहलाए, कभी जग के पालनहार

अधर्मो के विरुद्ध सदा धर्म की ललकार हैं मोहन।

जहाँ भी प्रेम, वहाँ मोहन, जहाँ भी भक्ति, वहीं वो हैं

हरएक कण में समाए हैं, जगत के सार हैं मोहन।।

- प्रणव झा (02.03.2025)