Friday, 2 May 2014

मंगल आह्वान !

देकर तूने प्रणय का दान
बढाया मेरा कुछ अभिमान
सामाऊं फूले न हे देवी!
संग ले तेरे अपना नाम।

अकेले चला चलूँ जिस ओर
सुनकर कर्तव्य की पुकार
मिला बल मुझको पाकर आज
पारितोषिक तेरा अनमोल।

रहा चलता कब से पथ पर
अकेला सतकर्मों में लीन
उठी ये आंधी कैसी आज?
बजाया उर ने कैसा बीन!

गया सहसा किस रस में भीग
हृदय मेरा निश्छल रसहीन;
विकल-सी दौड़ दौड़ प्रतिकाल
सरित हो रही सिन्धु में लीन।

झुकी जाती पलकें निस्पंद
दिवस के श्रम का लेकर भार
बातें करूँ फिर भी तुझसे
मोहिनी! जान तेरा आभार।

निशा कर रही मधुर स्पर्श
संजोकर सपनों का संसार
ठहर कुछ पल रात्री अब शेष
कि करनी बातें हैं दो चार।

चाँदनी की छाया में बैठ
करूँ पुरे अपने अरमान
आह! कर दूँ कलियों में बंद
मधुर पीड़ाओं का वरदान।

है चलना हर पथ पर अब साथ
दिवस जीवन के जो हैं शेष
निछावर कर दूँ अपने प्राण!
स्वामिनी करो शीघ्र आदेश।

हुआ पाकर तुझको मैं धन्य
रहा न बांकी कुछ अरमान
प्रणव की किरणों सी हे देवी
किया तूने उज्जवल मेरा भाल।।
(12 सितंबर 2010)

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