Friday, 4 January 2019

जन्मदिन : बकैती

जन्मदिन से याद आया की ९० के दशक में जब मैं बालक था, जन्मदिन जैसी कोई चीज मानाने की परम्परा हमारे क्षेत्र में नहीं थी. मैंने कभी नहीं देखा की मेरे माता-पिता-बहन-भाई आदि को कोई जन्मदिन की शुभकामना दे रहा हो या ये लोग किसी को ऐसा कर रहे हो. मैंने अपने गाँव या आसपास के गाँव या रिश्ते-नाते में भी कभी ऐसी चीजें नहीं सुनी थी. जब मैं दिल्ली आया था, तब भी शुरुआत में इधर भी बिहारियों में ऐसा कुछ देखने को मिला हो ऐसा याद नहीं आ रहा है. हाँ २००४-0५ के बाद से लोगों के आय में वृद्धि होनी शुरू हुई और निम्न-मध्यमवर्ग भी वैश्विक होने लगे थे. इसके बाद धीरे-धीरे आम मैथिलों में भी जन्मदिन मानाने, केक काटने और फुक्का फोड़ने का प्रचलन धीरे धीरे फ़ैलने लगा था.  इससे ये अनुमान स्वतः लग जाता है की ये प्रथा मैथिलों में परंपरागत रूप से नहीं थी, बल्कि वैश्विक बाजारवाद की उपज है. हाँ वैसे रामनवमी, कृष्णाष्टमी, बुद्ध पूर्णिमा, गुरु पूर्णिमा आदि मानाने की परंपरा प्राचीन काल से रही है, जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है की अवतारों और महान व्यक्तियों के जन्मोत्सव मानाने की परंपरा पुराने समय से रही है, और यह तिथि शक संवत या विक्रम संवत के अनुसार तय होती आ रही है. पर खैर अब हर कोई खुद को भगवान् से काम भी क्या समझता है!

मुझे याद है की सबसे पहला एकांकी नाटक जो मैंने गाँव में खेला था वो तैमूर लंग और वीर बालक बलकरण की कहानी थी, जिसमे मैंने बलकरण की भूमिका निभाई थी. इस नाटक में बलकरण की माँ उसके वर्षगाँठ में खीर बनाने के लिए दूध लेने गई होती है जब उसके घर पर तैमूर लंग का आक्रमण होता है. इसमें वर्षगाँठ शब्द का अर्थ शायद मीरा दीदी जी ने बाद में बताया था की बहुत से जगह पर लोग अपने जन्मदिन को मानते हैं और घर में अच्छे अच्छे पकवान बनते हैं, पूजा पाठ होता है इसी को वर्षगांठ कहते हैं. 'कल्याण' पत्रिका में जन्मदिन और श्राद्ध संबंधी दो बातें पढ़ी थी. एक तो ये की जन्मदिन पर आदमी को वृक्ष लगाना चाहिए और दूसरा की आपको श्राद्ध में भोज करने के लिए पैसे न हो तो गाय को घास खिलाना चाहिए, इससे भोज के बराबर का ही पुण्य मिलता है. इन दोनों ही बातों ने मेरे जेहन में घर कर लिया था. जबतक गांव में रहा था इन दोनों बातों को अमल में लाता रहा था.

खैर जन्मदिन मनाने और केक की कटाई का जो सबसे मजेदार किस्सा याद आ रहा है वो बताता हूँ. मिथुनमा मेरे और अपने घर में मिला के सबसे छोटा था. हम एक परिवार की तरह ही रहते थे. जैसा की मैंने कहा हमारे यहां जन्मदिन मानाने और केक की कटाई जैसा कोई कांसेप्ट ही नहीं था. पर टीवी में कुछ फिल्मों आदि में देखकर लोगों को जानकारी होने लगी थी. एकबार मिथुनमा का जन्मदिन था और राजा भैया उसको चढ़ा बढ़ा दिए थे की तुमको मम्मी-पापा मानते ही नहीं है नहीं तो तुम्हारा जन्मदिन मनाते, पार्टी करते. बात उसके मन में घर कर गयी और वो जिद पर बैठ गया की उसका जन्मदिन मनाया जाये. आंटीजी बोली ठीक है आज पूरी-पकवान बन जायेगा घर में मगर वो जिद पर अड़ गया था की नहीं जैसे टीवी में मनाते हैं वैसे ही मानना होगा. फिर यही तय हुआ की शाम को ऐसा ही पार्टी रखा जायेगा. राजा भैया बाजार से कलर रिबन, फुक्का आदि ले कर आ गए. हम बच्चे लोगों के लिए ये नया अनुभव था. सभी लोग उत्सुकता से सजावट में लग गए कलर रिबन से हैपी बर्थडे लिखा गया, फुक्के से रूम  को सजाया गया. बाजार से समोसे,मिठाई, बिस्किट, टॉफी और नमकीन भी आ गए. क्योंकि क्षेत्र में बर्थडे का कांसेप्ट नहीं था सो केक भी नहीं मिलता था. फिर आंटीजी ने उपाय निकला और सूजी के हलवे का केक तैयार हो गया. और हमारे मिथुन दा ने वही केक काटा, हम सभी ने थपड़ी बजाते हुए हैप्पी बर्थडे टू यु बोला और फिर कागज के प्लेट में सभी उपरोक्त खाद्य को खाने-पिने लगे. जहां तक मुझे याद है आगे मिथुन समझदार हो गया था और अगले साल से ये परंपरा कंटीन्यू नहीं रह सकी थी.

इस परंपरा को मुन्नी और आसू ने आगे बढ़ाया. हमारे कालोनी में ये पहले बच्चे थे जो प्राइवेट स्कुल में पढ़े थे. इन दोनों का बर्थडे परंपरागत(अंग्रजी) तरीके से मनाया जाता था. मुन्नी के बर्थडे में तो खैर प्लेट से ही काम चलाना पड़ता था पर क्योंकि आसू को बाबा(आसू के नानाजी) बहुत मानते थे इसलिए उसके बर्थडे पर भोज-भात का भी प्रबंध रहता था. उसके मामा दरभंगा से केक लाया करते थे. मुझे याद है उसका बर्थडे सर्दियों में ही आता था और हम बच्चे लोग आग तापते हुए भोज के लिए आलू और मटर छिला करते थे.

आपका बचपन कदाचित बहुत हद तक आपके व्यवहार को निर्धारित करता है. इसिलए जन्मदिन मनाने जैसी (केक काटना-फुक्का फोड़ना) आदि बातों से मैं थोड़ा सा असहज भी हो जाता हूँ. पर दुनिया ऐसा कराती है. गाँव-गाँव, घर-घर में ऐसा होने लगा है, मेरे भी घर में होने लगा है, तो ये सब अच्छा ही होगा. आपके वैश्विक होने की कदाचित पहचान भी है ये. मुझे याद नहीं की बचपन में माँ कभी मुझे जन्मदिन की बधाई देती थी, पर अब वो भी फोन करके ऐसा करने लगी है.  मुझे इन चीजों से ऐतराज नहीं है पर लोग ये सब अब मुझपर थोपे जबकि मैं बड़ा हो गया हूँ, थोड़ा सा फिलॉसफर टाइप भी, तो थोड़ा सा असहज भी लगता है.

इन चीजों में मैं थोड़ा सा असहज इसलिए भी हो जाता हूँ की अभी चलन कुछ ऐसा हो गया है की लोग जन्मदिन में केक खाने की बजाय चेहरे पर लगते है, कोल्ड-ड्रिंक को पीने की बजाय इसको छलकते हैं फुक्का सब को भी तड़ाक-तड़ाक फोड़ते हैं. क्योंकि बचपन में इन सभी चीजों के लिए ललचाता था तो अब इनकी इस तरह बर्बादी पागलपन लगता है. पहली बार मुझे जन्मदिन पर कोई तौफा मिला था वो ऑफिस की तरफ से एक बुके था, जिसे मैंने ले तो लिया था पर मन ही मन सोचा था की कैसे बेवकूफ हैं, इससे अच्छा तो एक किलो फल दे देता तो घर ले जाकर खा तो सकते थे.

कुछ लोग ऐसे होते हैं की जो स्कुल के ज़माने में इ प्लस बी का होल स्केवर कभी याद नहीं रख पाए थे, पर इसका,उसका पता नहीं किसका, किसका जन्मदिन उनको रटा हुआ होता है. अब तो सोशल मिडिया के ज़माने में याद रखने की जरुरत भी नहीं होती. ये कम्पनिया,एप्प आपको और आपके सम्बंधित लोगों को बार-बार आपके जन्मदिन की याद भी दिलाते रहते हैं. पता नहीं ये क्या-क्या मैं आप सब को कहे जा रहा हूँ! बस कुछ बकैती करनी थी.

आप सभी प्रियजनों को उनके शुभकामनाओं और स्नेह के लिए कोटि कोटि धन्यवाद, जुड़े रहें, जुड़ाते रहें. जय भगवत्ती, जय जानकी . जय हो. शुभ हो. हरिॐ

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