Sunday, 15 January 2012

’एकलव्य’


सफ़लता के नये आयाम लिखने
चलें हम हर कदम आगे बढाकर ।
गुणों का अपने नित विकास करने
बढें ’एकलव्य’ का पथ अपनाकर ॥

नहीं हम स्वप्न का आकार करते
दिलासे का नया व्यापार करते ।
सफ़लता एक बस प्रिया है हमारी
तभी तो बस उसी का ध्यान करते॥

कठिन निर्घोष जीवन के सफ़र में
विजय के नित्य नये अध्याय लिखने।
समर में कुछ नये करतब दिखाते
निरंतर हम नये संधान करते॥

नये युग में नया संघर्ष करते
युवाओं के नये आधार हैं हम।
न चूके लक्ष्य से शर जिसका कभी भी
वही शर-चाप धर ’एकलव्य’ हैं हम॥

     -प्रणव झा "सुरज का सातवां घोडा."

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