Friday, 18 April 2014

रात तुम फिर आ गई मुझको चिढाने


रात तुम फिर आ गई मुझको चिढाने
सारी अंधियारी खुद में समेटे हुई हो
चांदनी ने मुझसे हँस कर कहा है
क्यों नादाँ तुम अँधेरे से डरे हुए हो
मैं खड़ी हूँ बांह अपनी फैलाए
सो जाओ मेरी आगोश में हर एक डर को भुलाकर
हर तिमिर से मैं तुमको बचाकर
पहुंचाउंगी वहा जहां खडा है सवेरा
मैं न बोला किन्तु मेरी उलझने बोली
चाँदनी   मेरा कहाँ तक साथ तुम दोगी
आएगी  अमावस छुपोगी बेवफा बनाकर
रात तो उस दिन भी आएगी मुझको चिढाने को
तब मैं पाउँगा तुझको कहाँ पर?
इसलिए नियति को मुझे खुद है बताना
बंद कर दो इस तरह मुझ को चिढाना
बंद कर दो इस तरह मुझको चिढाना ।

No comments:

Post a Comment