Thursday, 6 March 2014

दुविधा !!

समझ नहीं पा रहा हूँ मैं, कि हार मान लूँ 
या हर हद को पार कर दूँ, जीत की तमन्ना में 
क्या इस प्रकार से जीतकर मैं कुछ पा सकूंगा 
या कि हार मानकर चैन से जी सकूंगा ! 

ये कैसा चक्रव्यूह रचा है जीवन ने ? 
जो ललचा तो रहा है मुझे अपनी ओर 
पर मुझे मालुम नहीं कि मैं इसे भेद भी पाउँगा ? 
शायद कहीं मैं इसमे फंस चुका हूँ 
क्या मैं अपने कदमों को वापस खींच लूँ 
नहीं! ऐसा करना वीरता तो नहीं होगी 
और कमसे कम मैं कायर तो नहीं हूँ 
जिंदगी के दौड़ में मैं प्रथा तो नहीं आया 
पर हर रेस में दूसरा स्थान तो पाया है 

माना मुझे पूरा कुछ न मिला 
पर हरबार कुछ अंश तो मेरे हिस्से में आया है 
हे 'माँ' मुझे शक्ति दे इतना भर कि 
मैं पार पा सकूँ इन उलझनो से 
और जीत लूँ दिल इंसानियत का 
और इस मही पर अपना मुकाम बना सकूँ !! 

(miles to go before I sleep
there are lots of things I have to keep-27.01.2010)

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