Sunday, 1 January 2017

लप्रेक - लाजपत नगर मार्केट (Lajpat nagar market)

हैल्लो! हां कैसे हो?
ठीक हूं ।
अच्छा तुमने कहा था कि इतवार को तुम सेलेक्ट सिटी वोक घुमाने ले जाओगे सो मैं नहीं आ सकती, क्या तुम कल लाजपत नगर मार्केट ले चल सकते हो?
पर तुम्हारा बर्थडे तो इतवार को है न! और मेरी छुट्टी भी। कल तो मेरा आफ़िस रहेगा।
नहीं, इतवार को मेरे घर में कोई मेहमान आ रहे हैं, सो मैं नही अ सकती। तुम्हारा आफ़िस नेहरूप्लेस में ही तो है थोरी देर के लिए छुट्टी ले के भी तो आ सकते हो।
ओके ठीक है।
ठीक है, कल ग्यारह बजे हां । बाय।
(अगले दिन लाजपत नगर बस स्टाप पर)
ओह सारी। ज्यादा इंतजार तो नही करना पडा ना? उफ़्फ़ ! कितनी धूप है, मेरा तो आने का मन भी नही कर रहा था । अच्छा चलो जल्दि से रिक्शा ले लेते हैं ।
ओके।
चलो पहले कहीं बैठकर कुछ खाते हैं ।
अरे नहीं मैं घर से नस्ता कर के आई हूं। चलो पहले मेरा गिफ़्ट दिलाओ ।
ठीक है । चलते हैं ।
उस दूकान में चलते हैं वह लहंगा चुनरी और सूट की स्पेस्लिट दूकान है ।
(दूकान में पहूचते हैं)
भैया एक बढिया सूट दिखाओ ।
ये देखो अनरकली, ये पटियाला सूट, ये हिना सूट, ये चूड़ीदार, ये फ्रॉक सूट .....  
हां, ये बढिया है । तुम्हे कैसा लगा ।
तुम्हे अच्छा लगा तो बढिया ही होगा ।
अरे ये पर्पल वाला भी बहुत बढिया है, लेटेस्ट स्टाईल में ।
क्या मैं ये भी ले लूं ।
ठीक है ले लो ।
देख लो। फ़िर ये मत कहना कि पैसे खर्च करवा दिए ।
अरे भैयाजी का दिल बडा है पैसे की फ़िक्र क्या करना मैडम जी (दूकानदार उत्साहित करते हुए बोला )
कोई बात नही है ले लो । भैया ये कितने का है ? (वो बोला)
ये अनारकली वाला आठ हजार का और ये मोर्डन वाला चार हजार का ।
भैया डिस्काउंट कितना दोगे ? – डिस्काउटं कर के ही बोला है मैडमजी
(इधर ये दुकानदार से तोल-मोल करने लगी और वो मन ही मन पैसों का हिसाब लगाने लगा – जेब में करीब चार हजार हैं और डेबिट कार्ड में तेरह हजार! चलो डेबिट कार्ड से इज्जत तो बच जाएगी । बांकि आगे कैसे गुजारा करना है बाद में सोचेंगे)
पेमेंट कर के और दोनो कपडे पैक करवा के दोनो वहां से निकले ।
आगे बाजार में घूमते हुए वो बोली
सुनो एक बात कहूं ?
हां बोलो ।
अगले महिने मेरे भाई का बर्थडे है, उसके लिए एक शर्ट लेना है ।
ठीक है ले लो । वो बोला ।
दुकान से उसने एक शर्ट पसंद किया और दुकानदार से दाम पुछने लगी।
भैया ये शर्ट कितने की है ।
पांच सौ की ।
ठीक है, पैक कर दो । वो पेमेंट करते हुए बोला ।
एक तुम अपने लिए भी ले लो ना !
अरे नहीं रहने दो, पिछले महिने ही मैने दो शर्ट लिए थे (अपने हिल चुके बजट का अनुमान लगाते हुए उसने बहाना बनाया था )
ठीक है जैसी तुम्हारी इक्षा ।
आगे एक चश्मेवाला धूप चश्मा बेच रहा था ।
भैया ये कितने का है ।
तीन सौ का मैडमजी ।
अरे डेढ सौ का दोगे क्या (वो बोली)
नहीं! दो सौ लगेंगे ।
रहने दो यार (बीच में वो बोला)
अछा ले लो डेढ सौ का ही (चश्मेवाला बोला)
वो जानता था कि इस चश्मे की औकात सौ रूपए की भी नहीं है, पर वो इस वक्त अपनी रुसवाई नही चाहता था इसलिए चुपचाप चश्मेवाले को डेढ सौ रूपए थम्हा दिए ।
(अब उसे जोरों की भूख लग रही थी । आज घर से नास्ता कर के भी नहीं चला था। और खरीदारी के चक्कर में अब तक उससे फ़ुर्सत से कुछ बात भी तो नहीं कर पाया था! इसिलिए फ़िर से वो बोला:)
चलो चलकर कुछ खाते हैं और वहीं बैठकर गप्पे भी मारेंगे ।
अरे नहीं । मम्मी से दो घंटे का बोल के आई थी वो इंतजार कर रही होगी । अब हमें चलना चाहिए ।
अच्छा! ठीक है। वो बुझे मन से अपनी भूख और इच्छाओं को दबाते हुए बोला।
ओटो वाले भैया, गणेश नगर चलोगे क्या? हां हां अक्षर धाम मंदिर के नजदीक ही है ।
ढाई सौ लगेंगे मैडम ।
भैया दो सौ लगते हैं । दो सौ मे चल लो ठीक है । (औटो वाले लगभग धकियाते हुए बोली)
अरे सुनो । तुम्हारे पास दो हजार के छुट्टे हैं क्या मेरे पास दो हजार के ही नोट हैं ।
कोई बात नहीं मैं दे देता हूं , कहते हुए उसने दो सौ रुपए  औटो वाले को थम्हा दिए ।
अच्छा सुनो । अपनी शादी की बात घरवालों से कब करोगी उसने जाते जाते उससे पुछा ।
अरे इस बारे में बाद में बात करते हैं न । यह कहते कहते वो औटो में बैठ गई और औटो आगे बढ गया । वो औटो को जाते हुए देख रहा था जो धीरे-धीरे धुंधला होता हुआ आंखों से औझल हो गया था॥

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