Wednesday, 25 January 2017

ठिठुरता गणतंत्र

करने दो उनको मनमानी, कभी नहीं टोको रे
कुछ फिरंगी नस्लों के खातिर तुम, अपनो का पथ रोको रे|
कहते हैं गणतंत्र दिवस आई है बस आई है
कुछ चेहरों पे अट्टहास,बांकी पर मायूसी छाई है|
राजपथ पर लगा हुआ है संगीनों का मेला
चारों ओर भीड़ है किन्तु, गणतंत्र खड़ा है अकेला|
बनता हूँ भीड़ का अंग मैं भी पर, मेरी आवाज कहीं दब जाती है
इस तथाकथित लोकतंत्र में सुकून की, नींद नहीं आती है |
 फिर भी आशावान हूँ एकदिन सही वक्त आएगा
हर शोषित एकदिन इस मुल्क में सही न्याय पायेगा |

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